France Protest News : फ्रांस में महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के विरोध में लगातार तीसरे सप्ताह के आखिरी दिन हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। हालांकि, अधिकतर जगहों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से ही आयोजित किए गए थे, लेकिन शनिवार (31 अक्टूबर) को जैसे ही मुख्य रैलियां खत्म होने की ओर बढ़ीं, पेरिस समेत देश के कई बड़े शहरों में चेहरे पर नकाब पहने उपद्रवियों के समूहों ने पुलिस बलों के साथ हिंसक झड़पें शुरू कर दीं। इस हिंसा के बाद अब यह सवाल जोर-शोर से उठ रहा है कि आखिर ये नकाबपोश उपद्रवी कौन हैं, जो आम नागरिकों के शांतिपूर्ण आंदोलन को देखते ही देखते हिंसक संघर्ष में तब्दील कर देते हैं?

'कैसर्स' कौन हैं?

फ्रांस में सड़कों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे उपद्रवियों के लिए एक खास शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें 'कैसर्स' (Casseurs) कहा जाता है। फ्रांसीसी भाषा में 'कैसर्स' का शाब्दिक अर्थ होता है 'तोड़फोड़ करने वाले'। ये उपद्रवी किसी एक रजिस्टर्ड संस्था, औपचारिक राजनीतिक दल या केंद्रीय नेतृत्व से नहीं जुड़े होते हैं। ये छोटे-छोटे अनौपचारिक समूहों में बंटकर सक्रिय रहते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन हिंसक गुटों में अधिकतर युवा और उग्र या कट्टर वामपंथी (अल्ट्रा-लेफ्ट) विचारधारा से प्रेरित कार्यकर्ता शामिल होते हैं। इनकी कोई आधिकारिक सदस्यता सूची नहीं होती।

'कैसर्स' के काम करने का तरीका

'द लोकल' की 19 अक्टूबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक कैसर्स हमेशा बड़े आंदोलनों के आखिरी पड़ाव पर या प्रदर्शनों के किनारों पर सक्रिय होते हैं। ये आम लोगों की तरह अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण मार्च निकालने के बजाय सीधे पुलिस पर हमले करने और तोड़फोड़ फैलाने का काम करते हैं। अपनी पहचान छुपाने के लिए ये चेहरे पर नकाब, आंखों पर सुरक्षात्मक चश्मे और शरीर पर पूरी तरह काले कपड़े (ब्लैक ब्लॉक स्टाइल) पहनते हैं। इनके पास अक्सर हथौड़े, आतिशबाजी का सामान और पेट्रोल बम (मोलोटोव कॉकटेल) बनाने की सामग्री मिलती है। कैसर्स मुख्य रूप से बैंकों, रियल एस्टेट दफ्तरों, बड़े कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों और सरकारी संपत्तियों को अपना निशाना बनाते हैं। हालांकि, इन हिंसक समूहों में शामिल हर शख्स की सामाजिक पृष्ठभूमि एक जैसी नहीं होती।

31 अक्टूबर के प्रदर्शन में कैसा रहा हिंसा का पैटर्न?

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देशभर में 3.20 लाख लोगों ने इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, जिनमें से अकेले पेरिस की सड़कों पर 70 हजार लोग थे। अधिकतर रैलियां शांतिपूर्ण थीं, लेकिन पेरिस के पोर्टे डी शारांटों इलाके के पास काले कपड़ों में छिपे दर्जनों नकाबपोशों ने हथौड़ों का इस्तेमाल करके सड़कों से पत्थर उखाड़े और उन्हें पुलिसकर्मियों पर फेंका। सुरक्षा बलों पर आग लगाने वाली खतरनाक चीजें भी फेंकी गईं। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, स्टन ग्रेनेड दागे और लाठीचार्ज किया। पुलिस के अनुसार कुछ 100 उपद्रवियों का गिरोह लगातार सुरक्षा बलों को निशाना बना रहा था। अधिकारियों ने आशंका जताई थी कि पेरिस में 400 से 800 कट्टर वामपंथी कार्यकर्ता हिंसा फैलाने की नीयत से मौजूद हो सकते हैं।

हैलोवीन के मुखौटों की आड़ में उत्पात और क्रांतियों की धमकियां

कई उपद्रवी स्पाइडरमैन, फ्रैंकेंस्टाइन और अलग-अलग डरावने किरदारों की आड़ में सड़कों पर उतरे। चेहरे ढकने के लिए हैलोवीन के मास्क का भी जमकर इस्तेमाल किया गया। फ्रांस के गृह मंत्री लॉरां नूनेज ने चेतावनी दी थी कि जो भी नकाब या मास्क से चेहरा छिपाएगा, उस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। एजेंसियों को सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश भी मिले थे, जिनमें हैलोवीन की रात को हथियार बनाकर सड़कों पर उतरने और क्रांति शुरू करने की भड़काऊ अपीलें की गई थीं। हिंसा के बाद यह अफवाह भी उड़ी कि इसके पीछे विदेशी प्रवासियों का हाथ है। वैसे, 'द लोकल' की जांच में स्पष्ट हुआ कि कैसर्स को सीधे तौर पर अप्रवासी समुदाय से जोड़ने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। इनमें बड़ी संख्या में फ्रांसीसी नागरिक और उग्र वामपंथी विचारधारा से प्रभावित युवा ही शामिल हैं।

कैसे भड़का आंदोलन और आगे क्या होगा?

फ्रांस में इस बड़े जन-आंदोलन की शुरुआत बढ़ती महंगाई, बुनियादी जीवनयापन के बढ़ते खर्चों, आर्थिक विषमता और बदहाल होती सार्वजनिक सेवाओं के विरोध में हुई थी। इस आंदोलन में छात्र, ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि और प्रसिद्ध येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग शामिल हैं। वैसे, बाद में पुलिसिया बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के चोटिल होने की घटनाओं के बाद अब इसमें नागरिक स्वतंत्रता और विरोध दर्ज कराने के संवैधानिक अधिकार की मांगें भी जुड़ चुकी हैं। इससे पहले 17 अक्टूबर को हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई बड़े शहरों में दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी की भयानक घटनाएं हुई थीं। 31 अक्टूबर के प्रदर्शनों के दौरान दोपहर तक ही पुलिस ने 511 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था, जो 17 अक्टूबर की 217 गिरफ्तारियों के मुकाबले काफी अधिक है।

आने वाले दिनों का अलर्ट

छात्र संगठनों ने ऐलान किया है कि वे नवंबर के पहले हफ्ते से स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कराएंगे। 5 नवंबर को मजदूर संगठनों (ट्रेड यूनियनों) के साथ मिलकर देशभर में और भी बड़ा एवं व्यापक प्रदर्शन करने की पूरी तैयारी है।