अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में मिशिगन से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है। वह अमेरिकी सीनेट के लिए निर्वाचित होने वाले देश के पहले मुस्लिम नेता बन गए हैं। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार और पूर्व सांसद माइक रोजर्स को हराया। इस मुकाबले पर पूरे देश की नजरें थीं, क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान कई बार अल-सैयद को ‘जिहादी’ बताया था और उन पर मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े होने के आरोप लगाए थे। सीबीएस न्यूज ने भी अल-सैयद की जीत का अनुमान जताया है। रॉयटर्स के मुताबिक, उनकी जीत से मिशिगन की यह सीट डेमोक्रेटिक पार्टी के पास बरकरार रही है। अल-सैयद की जीत अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से ऐतिहासिक मानी जा रही है। 

माइक रोजर्स को मिले 46.3 फीसदी वोट

मिशिगन में यह मुकाबला काफी करीबी रहा। न्यूयॉर्क टाइम्स के आंकड़ों के अनुसार, अब्दुल अल-सैयद को 51.7 प्रतिशत वोट मिले, जबकि रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स 46.3 प्रतिशत मत हासिल कर सके। 63 वर्षीय रोजर्स अमेरिकी कांग्रेस के पूर्व सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने 2024 में भी सीनेट का चुनाव लड़ा था, लेकिन डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एलिसा स्लॉटकिन से हार गए थे। 

कौन हैं अब्दुल अल-सैयद?

42 वर्षीय अब्दुल अल-सैयद मिस्र मूल के अमेरिकी नेता हैं। उनका जन्म 31 अक्टूबर 1984 को मिशिगन में हुआ था। वह पेशे से डॉक्टर और प्रोफेसर हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से स्नातक करने के बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पब्लिक हेल्थ में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। इसके बाद कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल डिग्री ली। महज 30 साल की उम्र में वह डेट्रॉइट के स्वास्थ्य विभाग के सबसे युवा निदेशक बने थे। वह दक्षिण-पूर्वी मिशिगन के डेट्रॉइट और वेन काउंटी में स्वास्थ्य विभाग का नेतृत्व कर चुके हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रगतिशील धड़े से जुड़े अल-सैयद को बर्नी सैंडर्स का करीबी माना जाता है। 

छोटे चंदे के दम पर लड़ा चुनाव

अल-सैयद ने अगस्त 2026 में डेमोक्रेटिक पार्टी का प्राइमरी चुनाव जीतकर सीनेट उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ किया था। उन्होंने प्रतिनिधि हैली स्टीवंस को हराकर पार्टी का टिकट हासिल किया। उनके अभियान की खास बात यह रही कि उन्होंने कॉरपोरेट चंदे के बजाय आम लोगों से मिले छोटे व्यक्तिगत योगदान पर भरोसा किया। उनके चुनावी एजेंडे में 'मेडिकेयर फॉर ऑल' प्रमुख मुद्दा रहा। इसके तहत सभी अमेरिकियों को सरकारी फंड से स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की वकालत की जाती है। इसके अलावा वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर सख्त सरकारी नियंत्रण के भी समर्थक हैं। 

ट्रंप ने क्यों कहा था 'जिहादी'?

चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने मिशिगन की रैलियों में अल-सैयद को निशाना बनाया था। उन्होंने उन्हें 'जिहादी' कहा और मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने का आरोप लगाया। ट्रंप ने यह दावा भी किया था कि अल-सैयद और उनका परिवार अमेरिका में शरिया कानून लागू करना चाहता है। इन आरोपों के समर्थन में कोई प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया। अल-सैयद ने मुस्लिम ब्रदरहुड या किसी चरमपंथी संगठन से संबंध होने की बात को पूरी तरह खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों का कोई आधिकारिक सबूत पेश नहीं किया गया है। 

ट्रंप के हमलों पर अल-सैयद का जवाब

ट्रंप के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए अल-सैयद ने कहा था कि उनकी पहचान और धर्म का इस्तेमाल मतदाताओं का ध्यान असली समस्याओं से हटाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने महंगाई, पेट्रोल की कीमतों, मकान के किराए और स्वास्थ्य सेवाओं को आम अमेरिकी परिवारों से जुड़े प्रमुख मुद्दे बताया। अपनी अंतिम चुनावी रैली में उन्होंने ट्रंप के उस बयान पर भी पलटवार किया था, जिसमें सीनेट में प्रवेश से पहले उनकी सुरक्षा जांच की बात कही गई थी। अल-सैयद ने कहा था कि वह मेटल डिटेक्टर से गुजरने के लिए तैयार हैं, लेकिन ट्रंप को पहले लाई डिटेक्टर से गुजरना चाहिए। अब मिशिगन में जीत के साथ अल-सैयद ने अमेरिकी राजनीति में नया इतिहास बना दिया है। उनकी सफलता से सीनेट में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व पहली बार दर्ज होगा।