America Midterm Election 2026 News : अमरीकी राजनीति इस वक्त बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। कल यानी 3 नवंबर 2026 को अमेरिका में मिडटर्म (मध्यावधि) चुनाव के लिए मतदान होने जा रहा। यह चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी सरकार के लिए बड़े अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। इस चुनावी रण के जरिए जनता फैसला करेगी कि आने वाले वक्त में संसद के दोनों सदनों पर रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा कायम रहेगा या नहीं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पार्टी को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन शुरुआती सर्वे उनके लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं, क्योंकि उनकी पार्टी पिछड़ती हुई दिखाई दे रही।
अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन का मतलब क्या होता है?
3 नवंबर को अमेरिकी मतदाता कांग्रेस यानी देश की संसद के नए सदस्यों को चुनेंगे। आसान शब्दों में कहें तो यह सीधे तौर पर सांसदों को चुनने का चुनाव है। अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहा जाता है और इसके दो सदन होते हैं:
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स : यह निचला सदन है, जिसकी तुलना आप भारत की लोकसभा से कर सकते हैं।
सीनेट : यह उच्च सदन है, जिसकी तुलना आप भारत की राज्यसभा से कर सकते हैं।
अमेरिका में संसद के चुनाव हर दो साल बाद होते हैं। जब ये चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक बीच में कराए जाते हैं, तब इन्हें मिडटर्म इलेक्शन कहा जाता है। इन चुनावों के नतीजों को सीधे तौर पर इस बात के जनमत संग्रह के रूप में देखा जाता है कि देश की जनता मौजूदा राष्ट्रपति के कामकाज और नीतियों से कितनी संतुष्ट है।
इस चुनाव में असल में किसका फैसला होना है?
इस बार के मध्यावधि चुनाव में संसद के दोनों सदनों के लिए बड़े पैमाने पर वोटिंग हो रही है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ( निचला सदन ) के सभी 435 सदस्यों का चुनाव होना है। भारत में जहां लोकसभा सांसद का कार्यकाल 5 साल का होता है, वहीं अमेरिका में हाउस के सांसदों का कार्यकाल सिर्फ दो साल का ही होता है। सीनेट ( उच्च सदन ) की कुल 100 सीटों में से इस बार 35 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। अमेरिका में एक सीनेटर का कार्यकाल पूरे छह साल का होता है। इसके अलावा इस मिडटर्म चुनाव के साथ देश के बड़े हिस्से में मतदाता स्थानीय स्तर के नेताओं और गवर्नर्स को भी चुन रहे। इनमें कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा, जॉर्जिया और मिशिगन के गवर्नर पद के चुनाव पर देश-दुनिया की खास नजर टिकी है।
ट्रंप के लिए चुनाव क्यों जीवन-मरण का सवाल?
भारत की तरह अमेरिका की शासन व्यवस्था में भी सरकार के तीन मुख्य अंग हैं-कांग्रेस (संसद), राष्ट्रपति और न्यायपालिका। देश में कानून बनाने की मुख्य ताकत संसद के पास होती है, इसलिए वहां बहुमत होना किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी ताकत है। फिलहाल संसद के दोनों सदनों पर डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी यानी रिपब्लिकन पार्टी का कब्जा है। मगर, यह बहुमत बेहद नाजुक और कम अंतर वाला है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में रिपब्लिकन के पास 218 सीटें हैं, जो बहुमत का जादुई आंकड़ा है। इसके अलावा एक निर्दलीय सांसद का समर्थन भी उनके साथ है। सीनेट में रिपब्लिकन के पास 53 सीटें हैं। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 47 सीटें हैं और 2 सीटें निर्दलीयों के पास हैं। डेमोक्रेट्स पार्टी को सीनेट पर कब्जा जमाने के लिए कम-से-कम 51 सीटों की जरूरत है, ताकि 50-50 की बराबरी की स्थिति आने पर उपराष्ट्रपति के निर्णायक वोट के जरिए हार से बचा जा सके।
रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण रहा तो क्या होगा?
विपक्षी डेमोक्रेट्स पार्टी इनमें से किसी भी एक सदन पर नियंत्रण हासिल कर लेती है तो वे अपने हिसाब से नए कानून ला सकेंगे और ट्रंप सरकार के हर फैसले व नीतियों पर ब्रेक लगा सकेंगे। इतना ही नहीं, वे समितियों के माध्यम से ट्रंप सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार, व्हाइट हाउस में नया बॉलरूम बनवाने के विवाद और इमिग्रेशन एजेंट्स की कार्रवाइयों जैसी कई गंभीर जांच भी शुरू कर सकते हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर इस बात पर भी लगातार बहस छिड़ी है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप पर महाभियोग चलाया जाना चाहिए या नहीं। इसके विपरीत रिपब्लिकन पार्टी का संसद पर नियंत्रण बरकरार रहता है तो राष्ट्रपति ट्रंप अपने कार्यकाल के बचे समय में अपनी योजनाओं और नीतियों को बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ाते रहेंगे।
क्या अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी पर मंडरा रहा गंभीर खतरा?
चुनावी विश्लेषक नेट सिल्वर के अनुसार अमेरिकी इतिहास का बहुत पुराना और दिलचस्प ट्रेंड रहा है कि मिडटर्म चुनावों में जनता हमेशा सत्ताधारी राष्ट्रपति की पार्टी के खिलाफ वोट करती है। 1934 से 2018 के बीच के इतिहास में केवल तीन ऐसे मौके आए हैं, जब राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस में सीटें बढ़ाई हों। अमेरिकी संविधान के मुताबिक संसद राष्ट्रपति की शक्तियों पर लगाम लगाने का काम करती है। राष्ट्रपति अपनी पार्टी का बहुमत संसद के एक या दोनों सदनों में खो बैठते हैं तो उनके लिए कोई नया कानून पास कराना, बजट मंजूर कराना या अपनी पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति करना बेहद कठिन हो जाता है। ट्रंप की पार्टी कांग्रेस पर से नियंत्रण खोती है तो राष्ट्रपति अपना चार साल का कार्यकाल तो पूरा कर लेंगे, लेकिन उनके हाथ से फैसले लेने की बड़ी ताकत छिन जाएगी। विपक्ष के नियंत्रण वाली कांग्रेस उनके खिलाफ जांच बिठा सकती है और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाया जा सकता है। वहां से मंजूरी मिलती है तो सीनेट में मुकदमा चलता है और राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए दो-तिहाई सदस्यों का भारी समर्थन चाहिए होता है। यानी भले सीधी कानूनी कार्रवाई न हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ट्रंप की कुर्सी पर खतरे के बादल मंडराने लगते हैं।
चुनाव की मौजूदा जमीनी स्थिति क्या है?
सीनेट : रिपब्लिकन के पास 53, डेमोक्रेट्स के पास 47, निर्दलीय के पास 2 सीटें हैं। इस बार सीनेट की कुल 33 नियमित सीटों के साथ फ्लोरिडा और ओहायो के विशेष चुनावों को मिलाकर कुल 35 सीटों पर मतदान होना है।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स : यहां रिपब्लिकन के पास 218 और डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें हैं। एक सीट निर्दलीय के पास है। दो सीटें खाली हैं। यहां सभी 435 सीटों पर जनता फैसला सुनाएगी।
मतदान की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है?
अमेरिका में नागरिकों के लिए वोट डालने के कुल तीन मुख्य तरीके तय किए गए हैं:-
- तय मतदान के दिन पोलिंग बूथ पर व्यक्तिगत रूप से जाकर वोट करना।
- समय से पहले पर्सनल वोटिंग का विकल्प चुनना।
- डाक (मेल) के जरिए अपना वोट भेजना।
जैसे ही मतदान की रात होती है, वोटों की गिनती का काम तुरंत शुरू हो जाता है। हालांकि, डाक द्वारा आए वोटों और विदेशी मेल वोटों की गिनती की अलग-अलग राज्यों में अपनी अलग समयसीमा होती है। पूरी चुनाव प्रक्रिया की कड़ी ऑडिटिंग और वेरिफिकेशन के बाद ही आधिकारिक नतीजे दुनिया के सामने आते हैं।
भारत के लिए यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण?
विदेश मामलों के विशेषज्ञ वाएल अव्वाद ने एक इंटरव्यू में बताया है कि इन मिडटर्म चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी जीत जाती है और राष्ट्रपति ट्रंप के पास पूरी ताकत सुरक्षित रहती है तो इसका भारत पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। यह असर मुख्य रूप से H-1B वीजा, ट्रेड टैरिफ, सख्त इमिग्रेशन नियमों के मोर्चे पर दिख सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका भले भारत को Quad और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपना बेहद अहम रणनीतिक साझेदार मानता हो, पर ट्रंप की नीतियां अक्सर इस दीर्घकालिक साझेदारी से अलग रुख रखती रही हैं। ट्रंप पूरी ताकत के साथ सत्ता में मजबूत बने रहते हैं तो वे और अधिक सख्त वीजा नियम लागू कर सकते हैं। उससे भारतीय प्रोफेशनल को परेशानी हो सकती है। वैसे, कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका हर हाल में भारत के साथ मजबूत रिश्ते बनाकर रखना चाहता है और यही वजह है कि भारत भी इस अमेरिकी चुनाव पर बहुत बारीकी से नजर गड़ाए है। इस चुनाव परिणाम के बाद अमेरिकी नीतियों में किस तरह के बड़े बदलाव आ सकते हैं, इस पर आपकी क्या राय है?