Mayawati Party BSP News : उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी बसपा (BSP) का संसद में प्रतिनिधित्व खत्म हो रहा है। यूपी विधानसभा चुनाव से पहले 25 नवंबर के बाद पार्टी का राज्यसभा में भी कोई सांसद नहीं बचेगा। लोकसभा में बसपा की उपस्थिति पहले से शून्य है। साल 1989 में संसद में पहुंचने के बाद यह पहली बार होगा, जब पार्टी सदनों में गैर-मौजूद होगी। साल 1984 में कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक ताकत और प्रतिनिधित्व देने के मकसद से बसपा की स्थापना की थी। पार्टी की राजनीति में यह विचार प्रमुख रहा कि जिस समुदाय की संख्या जितनी ज्यादा हो, सत्ता में उसकी हिस्सेदारी उतनी हो। वैसे, एक दशक से बसपा के राजनीतिक प्रभाव में लगातार गिरावट दिखी है। अब बसपा के सामने राजनीतिक आधार बचाए रखने की चुनौती है।
राज्यसभा में इकलौते बसपा सांसद रामजी गौतम
दरअसल, चुनाव आयोग ने एक दिन पहले ही उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव की तारीख का ऐलान किया है। ये सीटें खाली होंगी। इनमें बसपा के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम भी शामिल हैं। उनका कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा। उनके बाद बसपा का राज्यसभा में कोई सांसद नहीं होगा। यूपी विधानसभा में पार्टी का पर्याप्त संख्या बल नहीं है। इस कारण इन चुनावों के बाद भी पार्टी के किसी नए सांसद के राज्यसभा पहुंचने की संभावना भी नहीं बन रही है। इन 10 सीटों में से भाजपा 8 सीटें जीतने की स्थिति में है। समाजवादी पार्टी के खाते में दो सीटें जाने की पूरी संभावना है।
यूपी विधानसभा में भी बसपा का एक भी विधायक नहीं
बसपा के लिए स्थिति मुश्किल है, क्योंकि 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में उसका कोई विधायक नहीं है। अगस्त में बलिया जिले के रसड़ा से विधायक उमाशंकर सिंह के निधन होने के बाद विधानसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व खत्म हो गया।
साल 2012 में शुरू हुई थी गिरावट
यूपी विधानसभा चुनाव 2012 को बसपा के राजनीतिक पतन का महत्वपूर्ण मोड़ बताया जाता है। उस चुनाव में पार्टी की सीटें 206 से घटकर 80 रह गईं। पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। इससे पहले के विधानसभा चुनाव में पार्टी विधानसभा में 206 सीटें जीती थी। मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनी थीं। उसके बाद पार्टी का विधानसभा में प्रभाव कमजोर हो गया।
साल 2014 के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी कमजोर
लोकसभा चुनाव 2014 से मायावती की पार्टी की स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होनी शुरू हुई थी। तब भाजपा ने 303 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। लोकसभा चुनाव 2009 में बसपा ने 21 सीटें जीती थीं। उसे 6.17% वोट मिले थे। मगर, साल 2014 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीती। वैसे, उसका वोट शेयर 4.19% था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की बड़ी जीत को दलित वोट के बसपा से भाजपा की ओर जाने से जोड़ा गया। भाजपा ने प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर जीत ली थी।
साल 2019 में वापसी दिखी, पर 2024 में फिर झटका
बसपा ने लोकसभा चुनावों में वापसी के भी संकेत दिए थे। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने विपक्षी महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था। गठबंधन में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल भी थे। BSP ने 10 सीटें जीती थी। वोट शेयर 3.67% था। मगर, साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन से दूरी बनाए रखी। चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीती। साथ ही वोट शेयर घटकर 2.06% बचा।
बसपा का वोट बैंक भी खिसक रहा?
पार्टी के कमजोर प्रदर्शन ने उसके पारंपरिक वोट बैंक पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर एससी वर्ग के वोट और इनमें भी जाटव समुदाय के समर्थन को लेकर चर्चा तेज है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ एससी वर्ग के वोट को लेकर भाजपा, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के बीच मुकाबला तेज है। प्रदेश में दलित वोट बैंक 21% है। इनमें जाटवों की हिस्सेदारी 54% से अधिक होने का अनुमान है। बसपा के पारंपरिक आधार माने जाने वाले गैर-जाटव दलितों को साथ जोड़ने के लिए भाजपा की भी कोशिशें जारी हैं।
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा अब खतरे में
बसपा के सामने बड़ी चुनौती चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों की स्थिति की होने वाली समीक्षा भी है। बसपा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी गंवा सकती है। दरअसल, मौजूदा स्थिति में वह चुनाव आयोग के मानदंडों को पूरा नहीं करती है। चुनाव आयोग समय-समय पर राजनीतिक दलों की मान्यता की समीक्षा कर रहता है।
राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए मानदंड क्या?
किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए तय मानदंडों में से न्यूनतम एक पूरा करना होता है। मापदंडों में शामिल हैं-पिछले लोकसभा चुनाव में 4 या उससे अधिक राज्यों में कुल वैध वोटों का न्यूनतम 6% हासिल करना। कम-से-कम 4 सांसद होना। लोकसभा की न्यूनतम 2% सीटें जीतना और ये विजेता कम-से-कम 3 राज्यों से हों। न्यूनतम 4 राज्यों में मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी होना। बसपा के सामने अब चुनौती सिर्फ संसद में वापसी की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को बनाए रखने तथा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने की भी है।