इजरायल के आम चुनाव के एग्जिट पोल ने देश की राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे के बीच मुकाबला बेहद करीबी नजर आ रहा है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, दोनों ही पक्ष 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट में बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े से पीछे हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि नेतन्याहू एक बार फिर प्रधानमंत्री बन पाएंगे या विपक्ष सरकार बनाने में सफल होगा। 

एग्जिट पोल में दोनों खेमों के बीच कांटे की टक्कर

इजरायल के प्रमुख टीवी चैनलों के एग्जिट पोल के अनुसार, नेतन्याहू के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन को करीब 51 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को भी लगभग इतनी ही सीटें मिल सकती हैं। चैनल 12 के अनुमान में दोनों पक्षों के आंकड़ों में थोड़ा अंतर दिखाई दिया है। किसी भी सर्वेक्षण में किसी एक खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। इजरायल में सरकार बनाने के लिए नेसेट की कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में चुनावी नतीजों के बाद छोटे दलों का समर्थन हासिल करना दोनों प्रमुख खेमों के लिए अहम हो सकता है। अंतिम नतीजे आने के बाद सरकार गठन को लेकर लंबी बातचीत भी हो सकती है।

अरब पार्टियों की सीटों में बड़ी बढ़ोतरी का अनुमान

इस चुनाव में अरब नेतृत्व वाली पार्टियां अहम भूमिका में उभरती दिखाई दे रही हैं। एग्जिट पोल के मुताबिक, रा'म और जॉइंट लिस्ट को मिलाकर करीब 18 से 19 सीटें मिल सकती हैं। पिछले संसद में इन दोनों दलों के पास कुल 10 सीटें थीं। इस बढ़त के कारण सरकार गठन की प्रक्रिया में उनका समर्थन निर्णायक साबित हो सकता है। इन दलों के साथ गठबंधन करना आसान नहीं होगा। नेतन्याहू के सहयोगी दक्षिणपंथी दलों के साथ-साथ विपक्ष के कुछ नेताओं ने भी अरब पार्टियों को सरकार में शामिल करने को लेकर आपत्तियां जताई हैं। इसके बावजूद, अगर कोई भी बड़ा खेमा बहुमत तक नहीं पहुंचता है, तो अरब दलों का बाहरी समर्थन या मतदान के दौरान उनका रुख सरकार गठन की दिशा तय कर सकता है।

नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी, फिर भी राह मुश्किल

एग्जिट पोल के कुछ अनुमानों में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती दिख रही है। लेकिन संसदीय व्यवस्था में केवल सबसे बड़ी पार्टी होना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। किसी भी गठबंधन को संसद में बहुमत का समर्थन जुटाना होगा। यही वजह है कि लिकुड के प्रदर्शन के बावजूद नेतन्याहू की सत्ता में वापसी तय नहीं मानी जा रही है। वहीं, आइजेनकोट के खेमे को भी बहुमत हासिल करने के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना होगा। यदि बातचीत के बाद भी कोई पक्ष सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंचता है, तो देश में राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है।

अब आगे क्या होगा?

आधिकारिक नतीजे सामने आने के बाद इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग राजनीतिक दलों के नेताओं से बातचीत करेंगे और उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना होगी। गठबंधन बनाने की प्रक्रिया सफल नहीं होने पर दोबारा चुनाव कराने की नौबत भी आ सकती है। इस बीच, नई सरकार बनने तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में बने रह सकते हैं। फिलहाल एग्जिट पोल को अंतिम नतीजा नहीं माना जा सकता। वास्तविक तस्वीर आधिकारिक मतगणना पूरी होने के बाद ही साफ होगी। लेकिन शुरुआती रुझानों ने संकेत दे दिया है कि इस बार इजरायल में सरकार गठन का फैसला आसान नहीं रहने वाला और अरब पार्टियों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।