नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (EC) के बीच मतभेद का असर अब आयोग के कामकाज पर दिखने लगा है। खबरों के मुताबिक अधिकारियों के बीच सहमति न बनने से मतदाता सूची के वार्षिक पुनरीक्षण और अधिकारियों के तबादलों से जुड़े कई बड़े फैसले लंबे समय से अटके हैं। इस गतिरोध के चलते इस बार जून-जुलाई में होने वाला मतदाता सूची का वार्षिक पुनरीक्षण समय पर नहीं शुरू हो सका। इस देरी का सबसे ज्यादा असर जेन-जी यानी हाल में 18 साल के हुए युवाओं पर पड़ा है। आयोग ने नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए साल में चार बार पात्रता तिथियां तय की थीं, ताकि युवाओं को तुरंत रजिस्ट्रेशन का मौका मिले। मगर, विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) रुकने से लाखों युवाओं का नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो पा रहा है।
2025-26 में संक्षिप्त पुनरीक्षण नहीं हुआ
हर साल जनवरी के पहले हफ्ते में देशभर में अंतिम मतदाता सूची जारी की जाती है, जिसके बाद संशोधन की प्रक्रिया चलती है। मगर, रिकॉर्ड बताते हैं कि जनवरी 2024 के बाद से किसी भी राज्य में एसएसआर प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई। वर्ष 2025 में केवल बिहार में SIR कराया गया था। असम को छोड़, जहां 1950 के दशक के बाद पहला पुनरीक्षण हुआ, अन्य राज्यों में वर्ष 2025-26 के दौरान SSR नहीं हुआ है।
क्या SIR के साथ-साथ SSR कराया जाना संभव है?
दो चुनाव आयुक्त ने SSR प्रक्रिया को तुरंत दोबारा शुरू करने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि यह बेहद संवेदनशील और समयबद्ध काम है, जिसे सामान्य तौर पर मई के अंत या जून की शुरुआत तक पूरा कर लिया जाता है। इसके लिए सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को समय पर निर्देश भेजे जाते हैं। वैसे, सूत्रों के अनुसार सीईसी ने इस विषय पर कानूनी सलाह मांगी है कि क्या SIR के साथ-साथ SSR कराया जाना संभव है या नहीं। चुनावी तंत्र में इस देरी से पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है। आयोग ने बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) के जरिए घर-घर जाकर जानकारी जुटाने जैसी शुरुआती तैयारियां तो कराई थीं। इसके बाद अगस्त से अक्टूबर के बीच ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी कर 30 से 45 दिनों में आपत्तियां मांगी जानी थीं, लेकिन अभी यह पूरी प्रक्रिया अव्यवस्थित पड़ी है। इसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनावों वाले राज्यों पर पड़ेगा। यूपी, गोवा, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में 2027 के चुनाव से पहले SSR होना अनिवार्य है। बिहार में भी अंतिम मतदाता सूची सामने आए एक साल से ज्यादा हो चुका है, पर वहां भी कोई नया संशोधन नहीं हुआ है।
प्रशासनिक कामकाज भी प्रभावित
नीतिगत फैसलों के साथ प्रशासनिक कामकाज भी इस गतिरोध की भेंट चढ़ चुका है। मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और उप-निर्वाचन अधिकारियों समेत 50 वरिष्ठ अधिकारियों के स्थानांतरण के आदेश अधर में लटके हैं। नियमों के मुताबिक इन आदेशों पर CEC और दो चुनाव आयुक्त के संयुक्त हस्ताक्षर होने जरूरी हैं, जो सहमति न बन पाने के कारण अब तक नहीं हो सके हैं।