Anant Singh Daughter Wedding News : दुलारचंद यादव हत्याकांड मामले में मोकामा से विधायक अनंत सिंह की मुश्किलें फिर बेहद बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए अनंत सिंह को 1 दिसंबर तक हर हाल में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का सख्त निर्देश दिया है। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने जांच एजेंसी को इस पूरे हत्याकांड की तफ्तीश अगले चार महीनों के भीतर मुकम्मल करने का फैसला सुनाया है। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने अनंत सिंह के लंबे-चौड़े आपराधिक इतिहास पर गहरी नाराजगी जाहिर की और यह तीखा सवाल उठाया कि आखिर 67 गंभीर आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड होने के बावजूद उन्हें पटना हाईकोर्ट से जमानत कैसे मिल गई थी।

बेटी की शादी की मोहलत की मांग हुई खारिज

अदालत में सुनवाई के दौरान अनंत सिंह के वकीलों की तरफ से दलील दी गई थी कि उनकी बेटी की शादी होने वाली है, इसलिए उन्हें सरेंडर करने के लिए कुछ वक्त दिया जाए। शादी का हवाला देकर अदालत से राहत की गुहार लगाई गई थी ताकि वह अनुष्ठान पूरे होने के बाद आत्मसमर्पण कर सकें। वैसे, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शिल्पी चौधरी ने अदालत की कार्यवाही का ब्यौरा देते हुए स्पष्ट किया कि सर्वोच्च अदालत ने इस मानवीय अपील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने साफ कर दिया कि उन्हें 1 दिसंबर तक सरेंडर करना ही होगा। अदालत के आदेश के मुताबिक जांच एजेंसी द्वारा चार महीने में रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद इस मामले को दोबारा सूचीबद्ध किया जाएगा, जिसके बाद जमानत की स्थिति और अन्य पहलुओं पर अंतिम कानूनी फैसला लिया जाएगा।

67 गंभीर मामलों का कच्चा-चिठ्ठा कोर्ट में पेश

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के दूसरे वकील अमरकांत पटेल ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के सामने अनंत सिंह के आपराधिक मुकदमों का पूरा ब्यौरा रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि इस बाहुबली नेता के खिलाफ हत्या (आईपीसी की धारा 302), हत्या के प्रयास (धारा 307), अपहरण और जबरन वसूली जैसे अत्यंत गंभीर और जघन्य अपराधों के कुल 67 मामले दर्ज हैं। वकील ने इस बात को भी मजबूती से रेखांकित किया कि चुनाव के दौरान दाखिल किए गए आधिकारिक चुनावी हलफनामे में भी इन तमाम मुकदमों और उनकी मौजूदा कानूनी स्थिति का साफ-साफ उल्लेख किया गया है, जो उनके आपराधिक रसूख को बयां करता है।

बढ़ती कानूनी और राजनीतिक फजीहत

यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश ऐसे वक्त में आया है, जब अनंत सिंह का राजनीतिक और कानूनी दायरा लगातार सिमटता जा रहा है। अदालतों में जिस तरह से अब हाई-प्रोफाइल मामलों में निचली अदालतों या हाईकोर्ट से मिलने वाली राहत पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कड़ी समीक्षा की जा रही है, उसने यह साबित कर दिया है कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं के लिए अब कानून की राह आसान नहीं रहने वाली है। एक तरफ जहां इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी देश की न्याय व्यवस्था में इस बात का कड़ा संदेश देती है कि जघन्य अपराधों और लंबे क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले आरोपियों को राहत देने से पहले अदालतों को सामाजिक सुरक्षा और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का बारीकी से ध्यान रखना चाहिए।