Maharashtra Farmers Suicide News : महाराष्ट्र में मौसम और आर्थिक अनिश्चितता के चलते कृषि संकट गहराया है। अतिवृष्टि, सूखे और फसलों के उचित दाम नहीं मिलने से किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा। हालत यह है कि चालू वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में केवल मराठवाड़ा क्षेत्र में 653 किसानों ने आत्महत्या की है। यानी औसतन हर दिन तीन किसान अपनी जीवनलीला समाप्त कर रहे। बीड और छत्रपति संभाजीनगर जिले इस स्थिति से सबसे अधिक प्रभावित हैं। राज्य के 75% हिस्से को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।

मराठवाड़ा पर प्राकृतिक और आर्थिक आपदा की दोहरी मार

मराठवाड़ा लंबे समय से मौसम के उतार-चढ़ाव और कृषि संकट का सामना कर रहा है। पिछले वर्ष हुई अतिवृष्टि ने खरीफ और रबी की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया था। किसान उस क्षति से उबर भी नहीं पाए थे कि चालू सीजन में कई इलाकों में वर्षा की कमी से सूखे जैसे हालात बन गए। सिंचाई के सीमित साधन, घटता भूजल स्तर और उपज में गिरावट ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। सोयाबीन, कपास (रूई) और तूर (अरहर) जैसी प्रमुख नकदी फसलों का उत्पादन प्रभावित होने से किसानों की शुद्ध आय में गिरावट आई है। इसके विपरीत, बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाइयों और मजदूरी की दरें बढ़ने से खेती की कुल लागत में वृद्धि हुई है। लागत और बाजार मूल्य के बीच बढ़ते अंतर तथा संस्थागत एवं गैर-संस्थागत (साहूकारी) ऋण के दबाव में जनवरी से अगस्त तक मराठवाड़ा के आठ जिलों में 653 किसानों की मौत दर्ज की गई है।

 जिलावार आंकड़े

बीड : 149 किसान

छत्रपति संभाजीनगर : 138 किसान

धाराशिव : 88 किसान

नांदेड़ : 82 किसान

जालना : 61 किसान  

लातूर : 46 किसान

परभणी : 45 किसान

हिंगोली : 44 किसान

बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की तुलना

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में कृषि क्षेत्र में आत्महत्या के मामलों में राज्यों के बीच अंतर देखा गया है। 

बिहार : NCRB की भारत में दुर्घटनावश मौतें और आत्महत्याएं रिपोर्ट के अनुसार बिहार में आधिकारिक तौर पर कृषि क्षेत्र (कृषक एवं कृषि मजदूर) में आत्महत्या के दर्ज मामले शून्य अथवा नगण्य श्रेणी में दर्शाए गए हैं। राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के अनुसार पिछले एक वर्ष और पांच वर्षों की अवधि में कृषि ऋण या फसल क्षति के कारण आत्महत्या का आधिकारिक मामला दर्ज नहीं हुआ है। वैसे, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों द्वारा आंकड़ों के दर्ज करने की प्रक्रिया और परिभाषाओं के अंतर के कारण आंकड़ों में यह भिन्नता दिखाई देती है।

उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश में NCRB के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों की आत्महत्या के मामले दर्ज हुए हैं। मगर, महाराष्ट्र की तुलना में यह संख्या काफी कम है। पिछले एक वर्ष में उत्तर प्रदेश में यह संख्या दो अंकों (100 से कम) में सीमित रही है। जबकि पांच वर्षों का कुल योग भी नियंत्रित दायरे में दर्ज किया गया है। उत्तर प्रदेश में सिंचित भूमि का बड़ा रकबा (नहरें और नलकूप) होने के कारण मानसून पर निर्भरता मराठवाड़ा की तुलना में कम है।

महाराष्ट्र : महाराष्ट्र में स्थिति सबसे गंभीर है। NCRB डेटा के अनुसार भारत में कुल कृषि आत्महत्याओं का 35% से 38% हिस्सा केवल महाराष्ट्र से आता है। राज्य में पांच वर्षों में 12 हजार से अधिक किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की है। इसमें विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हैं।  

कर्ज माफी का ब्योरा

महाराष्ट्र सरकार :  महाराष्ट्र सरकार ने समय-समय पर छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकरी सम्मान योजना (2017) और महात्मा जोतिराव फुले शेतकरी कर्जमुक्ति योजना (2019-20) के तहत कर्ज माफी लागू की है। इन योजनाओं के माध्यम से राज्य सरकार ने 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कृषि ऋण माफ किया है। इससे राज्य के 45 लाख से 50 लाख किसानों को सीधे तौर पर बकाया ऋणों से मुक्ति या प्रोत्साहन लाभ दिया गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार : उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2017 में किसान ऋण मोचन योजना की घोषणा की थी। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने 36 हजार करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की थी। इसके माध्यम से लघु एवं सीमांत श्रेणी के लगभग 86 लाख किसानों का 1 लाख रुपये तक का संस्थागत फसल ऋण माफ किया गया। पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई नई व्यापक कर्ज माफी योजना घोषित नहीं की है, बल्कि सिंचित बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया है।

बिहार सरकार : बिहार सरकार की नीतिगत प्राथमिकता सीधे कर्ज माफ करने के बजाय प्रत्यक्ष सहायता और फसल सहायता पर आधारित रही है। राज्य सरकार ने बीते पांच वर्षों में कोई भी व्यापक कृषि कर्ज माफी योजना लागू नहीं की है। राज्य सरकार ने कर्ज माफी के बजाय बिहार राज्य फसल सहायता योजना के तहत फसल नुकसान पर सीधे किसानों के खातों में मुआवजा राशि भेजने की व्यवस्था बनाई है।

केंद्र सरकार की नीतिगत स्थिति पर नजर

केंद्र सरकार ने पिछले पांच वर्षों या पिछले एक वर्ष में कोई भी राष्ट्रीय कृषि कर्ज माफी योजना लागू नहीं की है। भारत सरकार द्वारा अंतिम व्यापक राष्ट्रीय कर्ज माफी योजना वर्ष 2008 में कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना के तहत लाई गई थी। इसमें 52500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था। केंद्र सरकार का रुख यह है कि व्यापक कर्ज माफी से बैंकिंग क्षेत्र की साख संस्कृति पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए केंद्र सरकार कर्ज माफी के बजाय प्रत्यक्ष आय सहायता, बीमा, रियायती ऋण और अवसंरचना विकास पर बजटीय आवंटन बढ़ा रही है।

किसानों के लिए संचालित प्रमुख सरकारी योजनाएं एवं लाभार्थी

1. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) : पात्र किसान परिवारों को प्रति वर्ष 6 हजार रुपए की direct income support (तीन समान किस्तों में) प्रदान करना। इस योजना के तहत देश भर के 11 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ मिल रहा है। इसके माध्यम से अब तक 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि डीबीटी के जरिए स्थानांतरित की जा चुकी है।

2. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) उद्देश्य : प्राकृतिक आपदाओं, कीटों या बीमारियों के कारण फसल क्षति होने पर किसानों को वित्तीय सुरक्षा और बीमा दावों का भुगतान करना।  प्रतिवर्ष औसतन 4 करोड़ से अधिक किसान इस योजना के तहत अपनी फसलों का नामांकन कराते हैं। योजना के शुभारंभ से अब तक किसानों द्वारा दिए गए प्रीमियम के मुकाबले कई गुना अधिक (1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक) के बीमा दावों का भुगतान किया जा चुका है। 

3. किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना : किसानों को खेती की अल्पकालिक आवश्यकताओं और पशुपालन/ मत्स्य पालन के लिए रियायती ब्याज दर (4% प्रभावी दर) पर संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना। देश में 7.3 करोड़ से अधिक सक्रिय KCC खाताधारक हैं। केंद्र सरकार ने विशेष अभियान चलाकर पशुपालकों और मछुआरों को भी इससे जोड़ा है।

4. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) उद्देश्य : हर खेत को पानी और पर ड्रॉप मोर क्रॉप के तहत सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) को बढ़ावा देना। इस योजना अंतर्गत पिछले पांच वर्षों में 80 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया है, जिससे लाखों किसान लाभान्वित हुए हैं।  

5. कृषि अवसंरचना कोष : गांव और मंडी स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, सॉर्टिंग और ग्रेडिंग यूनिट्स जैसी कटाई-बाद की बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का ऋण वित्तपोषण। इसके तहत अब तक हजारों प्राथमिक कृषि साख समितियों, एग्री-स्टार्टअप्स और किसान उत्पादक संगठनों को रियायती ऋण स्वीकृत किया गया है।