भारत के मंदिरों में प्रसाद की कई अनोखी परंपराएं देखने को मिलती हैं, लेकिन तमिलनाडु के कुंभकोणम स्थित उप्पिलीअप्पन मंदिर की परंपरा बेहद खास है। यहां भगवान विष्णु को नमक रहित प्रसाद चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि भगवान को बिना नमक का भोजन ही प्रिय है। यह प्राचीन मंदिर आठवीं सदी का माना जाता है और यहां भगवान वेंकटेश्वर के रूप में विष्णु की पूजा होती है।
तायिर सादम: मंदिर का प्रसिद्ध प्रसाद
इस मंदिर में प्रसाद के रूप में सबसे प्रसिद्ध व्यंजन “तायिर सादम” है, जो दक्षिण भारत के लोकप्रिय कर्ड राइस का तमिल रूप माना जाता है। इसे दही और चावल से तैयार किया जाता है तथा इसमें राई, चना दाल और कड़ी पत्ते का तड़का लगाया जाता है। खास बात यह है कि इसमें नमक बिल्कुल नहीं डाला जाता।
इसके अलावा यहां “सुंदल” का भी भोग लगाया जाता है। यह उबले हुए चनों से बनने वाला सलाद होता है, जिसमें उड़द दाल, सरसों, सूखी लाल मिर्च, हल्दी और कड़ी पत्ते का तड़का लगाया जाता है। ऊपर से नारियल डालकर इसे परोसा जाता है। मंदिर में बिना नमक के वडा भी प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है।
नमक रहित प्रसाद के पीछे की पौराणिक कथा
इस अनोखी परंपरा का संबंध ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णित एक कथा से जुड़ा है। कथा के अनुसार, भूमि देवी ने भगवान विष्णु से पूछा कि उनमें महालक्ष्मी जैसे सभी गुण होने के बावजूद उन्हें विष्णु के हृदय में स्थान क्यों नहीं मिला।
भगवान विष्णु ने कहा कि उन्हें महर्षि मार्कण्डेय की पुत्री के रूप में जन्म लेना होगा। उस जन्म में उनका नाम तुलसी होगा और तभी वे उन्हें स्वीकार करेंगे।
इसी दौरान महर्षि मार्कण्डेय ने महालक्ष्मी जैसी पुत्री प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें जंगल में एक नवजात कन्या मिली, जिसे वे अपने घर ले आए और उसका नाम तुलसी रखा।
जब भगवान विष्णु वृद्ध बनकर पहुंचे
जब तुलसी विवाह योग्य हुईं, तब भगवान विष्णु “पेरुमल” नामक वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण कर महर्षि मार्कण्डेय के पास पहुंचे और तुलसी का हाथ मांगा।
महर्षि ने यह कहकर मना कर दिया कि उनकी पुत्री को तो खाने में नमक डालना तक नहीं आता। इस पर वृद्ध रूप में आए विष्णु ने कहा कि वे बिना नमक का भोजन भी स्वीकार कर लेंगे, लेकिन विवाह तुलसी से ही करेंगे।
तब महर्षि समझ गए कि यह कोई साधारण वृद्ध नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। इसके बाद उन्होंने खुशी-खुशी तुलसी का विवाह भगवान विष्णु से कर दिया।
‘उप्पिलीअप्पन’ नाम के पीछे का अर्थ
कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने बिना नमक का भोजन स्वीकार किया, इसलिए उन्हें “उप्पिलीअप्पन” कहा जाने लगा। तमिल भाषा में नमक को “उप्पू” कहा जाता है। इसी वजह से इस मंदिर में आज भी भगवान को नमक रहित प्रसाद ही अर्पित किया जाता है।
यही कारण है कि दक्षिण भारत के पेरुमल मंदिरों में भगवान विष्णु को तुलसी की माला अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से निभाई जाती है।