Supreme Court On Digital Arrest Compensation : सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते फर्जीवाड़े को लेकर ऐतिहासिक और बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी निर्दोष व्यक्ति ने इस ऑनलाइन ठगी के जाल में फंसकर अपनी गाढ़ी कमाई गंवाई है तो बैंक को उस नुकसान की भरपाई करनी होगी। मामले की सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने इस बात पर गहरी हैरानी और चिंता जताई कि आजकल पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी इस बात पर आसानी से यकीन कर रहे हैं कि उन्हें मोबाइल के जरिए गिरफ्तार किया जा सकता है, जबकि सरकार और प्रशासन की तरफ से लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

डिजिटल अरेस्ट के मामलों पर अदालत का स्वतः संज्ञान

शीर्ष अदालत में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ जाली दस्तावेजों और फर्जी आदेशों के सहारे किए जा रहे डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी गंभीर मुद्दे को देखते हुए बेंच ने इस मामले का खुद संज्ञान लिया है, क्योंकि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर देश भर में बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने आज की सुनवाई के दौरान कहा कि बैंकों को ऐसे साइबर अपराधों और ठगी के प्रति संवेदनशील ग्राहकों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच की भूमिका निभानी चाहिए। पीठ ने कहा, वित्तीय धोखाधड़ी का शिकार होने वाले पीड़ितों के आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए अब बैंकों को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया जाना बेहद जरूरी हो गया है।

क्या है मुआवजे की शर्त?

अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे शातिर अपराधों के पीड़ितों को कम-से-कम उतनी रकम का मुआवजा जरूर मिलना चाहिए, जितना उनका वित्तीय नुकसान हुआ है। वैसे, सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ एक स्पष्ट शर्त भी जोड़ी है। बेंच के मुताबिक बैंक मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी तभी उठाएगा जब यह साबित हो जाए कि धोखाधड़ी बैंक की अपनी तरफ से उचित सावधानी और चौकसी बरतने में हुई नाकामी के कारण हुई है। मामले में सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने शीर्ष अदालत को जानकारी दी कि अदालत के सख्त दखल के बाद देश में डिजिटल अरेस्ट के मामलों में आधी यानी 50% तक की गिरावट दर्ज की गई है। उन्होंने बताया कि बैंक अब संदिग्ध लेन-देन और ट्रांजेक्शन की लगातार पहचान कर रहे व नए सुरक्षा नियम तय करने के लिए RBI के साथ कई दौर की बैठकें भी की जा चुकी हैं।

बैंकों पर गिर सकती है गाज, दर्ज होगी एफआईआर

शीर्ष अदालत ने अब ऐसे सख्त निर्देश तैयार करने के संकेत दिए हैं जिनके तहत किसी भी डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में बैंक की लापरवाही या उचित सावधानी न बरतने का मामला सामने आता है तो बैंक को पीड़ित को पूरा मुआवजा देना ही होगा। यहां तक कि कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि ऐसे मामलों में दोषी बैंकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई यानी एफआईआर भी दर्ज की जा सकती है। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा, हम ऐसा कड़ा निर्देश देने का प्रस्ताव कर रहे हैं कि जहां कहीं भी इस तरह की धोखाधड़ी होगी, संबंधित बैंक पीड़ित को मुआवजा भी देगा और आपराधिक अभियोजन का सामना भी करेगा। अब ऐसा करना ही होगा।

पढ़े-लिखे लोगों की नासमझी पर फूटा सीजेआई का गुस्सा

सुनवाई के दौरान सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने इस बात पर गहरी झुंझलाहट और आश्चर्य जताया कि आखिर देश के पढ़े-लिखे और संभ्रांत लोग भी इस तरह के घटिया फर्जीवाड़े का शिकार कैसे बन जाते हैं। उन्होंने अपनी मौखिक टिप्पणी में नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि इन पीड़ितों को आखिर हो क्या गया है? वे इतनी आसानी से जालसाजों के बिछाए जाल में कैसे फंस रहे हैं? क्या वे इतनी सी बुनियादी बात भी अपने दिमाग में नहीं ला पा रहे हैं? आखिर कोई मोबाइल फोन पर किसी को कैसे गिरफ्तार कर सकता है?

'कोई डिजिटल अरेस्ट की बात कहे तो दीवार पर मारिए मोबाइल'

गुस्से और तंज के मिले-जुले अंदाज में सीजेआई ने सलाह देते हुए कहा कि जब भी कोई फोन पर डिजिटल अरेस्ट की बात कहे तो मोबाइल को सीधे दीवार पर दे मारिए, सारे झंझट अपने आप खत्म हो जाएंगे। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा, मोबाइल को दीवार पर पटक दीजिए, आपकी गिरफ्तारी का डर उसी पल खत्म हो जाएगा। लोगों के दिमाग में कुछ तो गड़बड़ चल रही है, भगवान जाने क्या है। एक लोकतांत्रिक और आजाद देश में आप किस तरह के नागरिक हैं, अगर आपको सचमुच यह लगता है कि मोबाइल फोन के जरिए आपकी गिरफ्तारी हो सकती है। जस्टिस सूर्यकांत ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए चिंता व्यक्त की कि ऐसे हालात देखकर भारी निराशा होती है कि आधुनिक शिक्षा पाने वाले लोग भी ठगी का आसान शिकार बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि आप इस उम्र में डिजिटल अरेस्ट जैसी बचकानी ठगी के जाल में फंस रहे तो आप अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या अच्छी सीख देंगे? उन्होंने आम जनता को सलाह दी कि किसी को भी गिरफ्तारी का शक हो तो वे खुद अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर यह जांच सकते हैं कि उनके नाम पर कोर्ट का कोई आदेश जारी हुआ है या नहीं।