मुंबई, 24 मई। हिंदी फिल्म उद्योग में जब बड़े निर्देशकों का जिक्र होता है, तो करण जौहर का नाम अनिवार्य रूप से लिया जाता है। पिछले 30 वर्षों में उन्होंने कई हिट फिल्में बनाई हैं और कहानी कहने का एक नया तरीका प्रस्तुत किया है। पारिवारिक ड्रामा, प्रेम, रिश्ते और भव्य सेटों वाली फिल्मों को उन्होंने एक विशेष पहचान दी है। करण जौहर हमेशा अपनी फिल्मों, फैशन, चैट शो और खुलकर बोलने के अंदाज के लिए चर्चा में रहते हैं, लेकिन एक समय ऐसा था जब वह न्यूमरोलॉजी, यानी अंकों और अक्षरों की शुभता पर विश्वास करते थे। इसी कारण उनकी अधिकांश फिल्मों के शीर्षक 'के' अक्षर से शुरू होते थे। एक फिल्म देखने के बाद उनकी सोच में बदलाव आया और उन्होंने इस आदत को छोड़ दिया।
करण जौहर का जन्म 25 मई 1972 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता यश जौहर ने हिंदी फिल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाई और धर्मा प्रोडक्शन की स्थापना की। उनकी मां हीरू जौहर भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हुई थीं। करण ने अपने बचपन का अधिकांश समय फिल्म और ग्लैमर की दुनिया में बिताया।
करण की करियर की शुरुआत पर्दे के पीछे से हुई। उन्होंने 1995 में आई मशहूर फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया। इस फिल्म में उन्होंने एक छोटा सा अभिनय भी किया था। उस समय करण को फैशन और कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग में गहरी रुचि थी और वह कई फिल्मों में कलाकारों के परिधानों से संबंधित सुझाव देते थे।
1998 में, करण जौहर ने अपने निर्देशन में पहली फिल्म 'कुछ कुछ होता है' बनाई। जिसमें शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में थे। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और करण को अपनी पहली फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने 'कभी खुशी कभी गम' और 'कभी अलविदा न कहना' जैसी मशहूर फिल्में बनाई, जिनके शीर्षक भी 'के' अक्षर से शुरू होते थे।
दरअसल, करण जौहर एक समय न्यूमरोलॉजी में विश्वास करते थे। उन्हें लगता था कि 'के' अक्षर उनके लिए अत्यंत शुभ है और इसीलिए उनकी फिल्में सफल होती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी फिल्मों के शीर्षक 'के' से रखने की आदत बना ली थी। उस समय बॉलीवुड में भी कई अभिनेता और फिल्म निर्माता न्यूमरोलॉजी को मानते थे और नामों की स्पेलिंग तक में बदलाव कर लेते थे।
हालांकि, करण की सोच समय के साथ बदल गई। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि जब उन्होंने राजकुमार हिरानी की फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई' देखी, तो उसमें न्यूमरोलॉजी का मजाक बनाया गया था। उस फिल्म का संदेश सुनकर उन्हें समझ आया कि मेहनत और कहानी का महत्व नाम के पहले अक्षर से कहीं अधिक है। इसके बाद उन्होंने 'के' अक्षर के प्रति अपनी सोच में बदलाव किया और फिल्मों के नामों को भिन्न तरीकों से रखने लगे।
इसके बाद, करण ने 'माई नेम इज खान', 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर', 'ए दिल है मुश्किल' और 'रॉकी और रानी की प्रेम कहानी' जैसी सफल फिल्में बनाई। उन्होंने केवल निर्देशन ही नहीं किया, बल्कि निर्माता के रूप में भी कई प्रमुख कलाकारों और निर्देशकों को मंच दिया। आलिया भट्ट, वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा जैसे सितारों को उन्होंने लॉन्च किया।
करण जौहर को कई प्रमुख पुरस्कार मिले हैं। उन्हें कई बार फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया है। 2020 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा। उनकी फिल्मों ने न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी है।
करण की जिंदगी में एक बड़ा दुख तब आया जब 2004 में उनके पिता यश जौहर का निधन हो गया। पिता के निधन के बाद करण ने अकेले धर्मा प्रोडक्शन की जिम्मेदारी ली और इसे बॉलीवुड के सबसे प्रमुख प्रोडक्शन हाउस में बदल दिया।