नई दिल्ली, 21 मई। राजा राममोहन राय, जिनका जन्म 1772 में हुआ, को आधुनिक भारत का संस्थापक माना जाता है। सामाजिक रूढिवाद, धार्मिक विश्वासों और कुरीतियों के खिलाफ उनके संघर्ष ने भारतीय समाज को प्रेरित किया है। वे सामाजिक विकास और धार्मिक सुधारों के क्षेत्र में एक सच्चे नेता रहे।
राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के राधानगर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने छोटेपन से ही संस्कृत, फारसी, अरबी, हिंदी, और बाद में अंग्रेजी, लैटिन और ग्रीक जैसी कई भाषाओं का अध्ययन किया। विभिन्न धर्मों का गहन अध्ययन करने के बाद, वे एक ईश्वर में विश्वास करने लगे। उन्होंने हिंदू धर्म की नई व्याख्या की, मूर्तिपूजा और अंधविश्वासों का विरोध किया।
उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान सती प्रथा के खिलाफ अभियान था, जो उस समय विधवाओं को पति की चिता पर जीवित जलाने की क्रूर प्रथा थी। राममोहन राय ने लेखन, साक्षात्कार और याचिकाओं के माध्यम से इस अमानवीय रिवाज का विरोध किया। उनके लगातार प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने सती प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया। यह भारतीय महिलाओं के उत्थान के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था।
धर्म सुधार में उनका सबसे बड़ा कार्य ब्रह्म समाज की स्थापना (1828) रहा। उन्होंने हिंदू धर्म को शुद्धता की ओर ले जाने की कोशिश की। ब्रह्म समाज एक ईश्वर की उपासना पर आधारित था, जिसमें मूर्तियों और कर्मकांडों का कोई स्थान नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी धर्मों का मूल सत्य एक ही है, और इस्लाम, ईसाई धर्म और हिंदू दर्शन का अध्ययन कर उनके बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया।
सामाजिक सुधारों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राममोहन राय ने बाल विवाह, बहुविवाह और दास प्रथा का सख्त विरोध किया। महिलाओं को शिक्षा और संपत्ति में अधिकार दिलाने, और विधवा विवाह को वैध बनाने के लिए उन्होंने लगातार आवाज उठाई। उन्होंने आधुनिक शिक्षा प्रणाली का समर्थन किया और अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया। 1817 में, उन्होंने हिंदू कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जो बाद में प्रेसिडेंसी कॉलेज बना।
राममोहन राय प्रेस की स्वतंत्रता के भी समर्थक थे। उन्होंने जन जागृति हेतु समाचार पत्रों का सहारा लिया और 'समवाद कौमुदी' और 'मिरात-उल-अखबार' जैसे पत्रों का प्रकाशन किया। वे भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करने के पक्षधर थे, लेकिन उन्होंने शिक्षा और सुधारों के बगैर राजनीतिक स्वतंत्रता को निरर्थक समझा। 1830 में, वे इंग्लैंड गए, जहाँ उन्होंने भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व किया। 27 सितंबर 1833 को उनका निधन ब्रिस्टल में हुआ।
आज जब हम समानता, महिला सशक्तीकरण और धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, तो राजा राममोहन राय का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वे न केवल एक सुधारक बल्कि एक विचारक, दार्शनिक और क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारत को आधुनिक युग की ओर अग्रसर किया।
उनका दृष्टिकोण आज भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि साम्प्रदायिक सद्भाव, महिला का सम्मान और वैज्ञानिक सोच जैसी चुनौतियाँ अभी भी हमारे सामने हैं। राजा राममोहन राय ने यह सिद्ध कर दिया कि एक व्यक्ति भी समाज को बदलने की क्षमता रखता है, यदि उसमें साहस, ज्ञान और दृढ़ संकल्प हो।