नई दिल्ली, 24 मई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की यात्रा इटली में न केवल राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने तक सीमित रही, बल्कि इस दौरे ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर, पारंपरिक हस्तकला और स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर व्यापक पहचान भी दिलाई। विभिन्न देशों के प्रमुख नेताओं को दिए गए जीआई टैग वाले उत्पादों के माध्यम से प्रधानमंत्री ने संदेश दिया कि भारत की सच्ची ताकत इसकी विविधता, सांस्कृतिक परंपराएं और स्थानीय कौशल में निहित है। जब हम विविधता और पारंपरिक कौशल की बात करते हैं, तो पूर्वोत्तर के सभी आठ राज्यों का जिक्र महत्वपूर्ण है। इनमें असम का मशहूर मूगा रेशम शॉल शामिल है, जिसे उपहार स्वरूप प्रदान किया गया। इन उपहारों ने न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान को प्रदर्शित किया, बल्कि स्थानीय कारीगरों और किसानों की मेहनत को भी सराहा।
आज पूर्वोत्तर भारत सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक कलाओं और जैविक उत्पादों के कारण भी वैश्विक पहचान बना रहा है। यहां के जीआई टैग प्राप्त उत्पाद यह दर्शाते हैं कि भारत की असली ताकत गांवों, कारीगरों और किसानों की मेहनत में छिपी हुई है।
असल में, जीआई टैग भारत में सिर्फ एक कानूनी पहचान नहीं है, बल्कि यह स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। जीआई, जिसका अर्थ 'जियोग्राफिकल इंडिकेशन' है, विशेष रूप से उन उत्पादों को दिया जाता है, जिनकी विशिष्टता किसी विशेष क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु, परंपरा या कारीगरी से जुड़ी होती है। इसी कारण से आज भारत के 600 से ज्यादा उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है।
पूर्वोत्तर भारत इस संदर्भ में देश का सबसे विविध और अद्वितीय क्षेत्र बनकर उभरा है। यहां की कृषि, हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्त्रों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान बनाई है। असम का मूगा सिल्क इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख उदाहरण है, जो अपनी चमक और टिकाऊपन के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसके अलावा, असम की जोहा राइस, काजी नेमू, बोका चाऊल, तेजपुर लीची और गमोसा भी जीआई टैग प्राप्त उत्पादों में शामिल हैं।
मणिपुर की पारंपरिक बुनाई कला भी देश के सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां का शाफी लानफी और वांगखेई फी विशेष अवसरों पर पहने जाने वाले वस्त्र हैं। मोइरांग-फी के कपड़ों की अनोखी डिजाइन और पारंपरिक शैलियां इसे एक विशेष पहचान देती हैं। इसके अलावा, मणिपुर का चक-हाओ काला चावल अपने स्वाद और स्वास्थ्यवर्धक गुणों के लिए खासा मशहूर है। कचाई नींबू और तामेंगलोंग संतरा भी यहां के महत्वपूर्ण उत्पादों में से हैं।
मेघालय की खासी मैंड्रिन संतरे और मेमोंग नारंग अपनी मिठास और रसदार स्वाद के लिए जाने जाते हैं। वहीं, मिजोरम की पारंपरिक शॉल और वस्त्र जैसे मिजो पुआनचेई, पवांडम और तावल्लोहपुआन राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करते हैं। मिजो मिर्च और मिजो अदरक भी अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए एक अलग पहचान रखते हैं।
नागालैंड का नागा किंग चिली, जिसे भूत जोलोकिया भी कहा जाता है, दुनिया की सबसे तीखी मिर्चों में से एक मानी जाती है। इसके अलावा, नागा ट्री टमाटर और नागा खीरा भी यहां की पारंपरिक खाद्य उत्पादों का अहम हिस्सा हैं। नागालैंड का चाखेसांग शॉल अपनी खूबसुरत बुनाई और डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध है।
त्रिपुरा का क्वीन पाइन एप्पल अपनी मिठास और सुगंध के लिए चर्चित है। वहीं, रीसा और रिग्नाई-पचरा वस्त्र राज्य की पारंपरिक पहचान माने जाते हैं। सिक्किम की बड़ी इलायची और डल्ले मिर्च भी अपनी गुणवत्ता के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत अधिक मांग में हैं।
अरुणाचल प्रदेश के जीआई टैग प्राप्त उत्पाद राज्य की अद्भुत आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक विविधता को वैश्विक मंच पर पेश करते हैं। यहां का वाक्रो संतरा अपने मीठे-खट्टे स्वाद और अधिक रस के लिए प्रसिद्ध है। इदु मिश्मी टेक्सटाइल पारंपरिक हाथ से बुनाई कला का शानदार उदाहरण है, जिसमें ज्यामितीय डिज़ाइन और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया है।
राज्य का खाव ताई यानी खामती चावल अपनी खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर है। यह स्थानीय जनजातियों की खान-पान और परंपराओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। याक चुरपी, जो याक के दूध से बनाई जाती है, अरुणाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में एक लोकप्रिय खाद्य उत्पाद है। तांगसा टेक्सटाइल भी यहां की पारंपरिक बुनाई कला का एक उत्कृष्ट नमूना है।
वास्तव में, जीआई टैग पूर्वोत्तर राज्यों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। इससे स्थानीय किसानों, बुनकरों और कारीगरों को नई पहचान मिल रही है, साथ ही उनके उत्पादों की औसत कीमत और मांग भी बढ़ रही है। इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं, और विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग भी बढ़ती जा रही है।