5 सितंबर 1986 की सुबह Pan Am Flight 73 कराची एयरपोर्ट पर रुकी थी। मुंबई से फ्रैंकफर्ट होते हुए न्यूयॉर्क जा रहे इस विमान में 379 लोग सवार थे। इसी दौरान हथियारबंद आतंकियों ने विमान पर कब्जा कर लिया। उस वक्त फ्लाइट की सीनियर पर्सर नीरजा भनोट ने जिस हिम्मत और समझदारी का परिचय दिया, उसने उन्हें हमेशा के लिए भारतीय इतिहास में अमर कर दिया। नीरजा ने कॉकपिट क्रू को खतरे की सूचना दी, जिससे पायलट विमान से निकलने में सफल रहे और आतंकी विमान को उड़ाने में नाकाम रहे। इसके बाद नीरजा ने यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली।
नीरजा ने छिपाए थे अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट
हाईजैकर्स अमेरिकी यात्रियों की पहचान करना चाहते थे। उन्होंने क्रू को सभी यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने का आदेश दिया। नीरजा और उनके सहयोगियों ने समझदारी दिखाते हुए कई अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपा दिए। कुछ पासपोर्ट सीटों के नीचे और अन्य जगहों पर रखे गए, ताकि आतंकियों को यात्रियों की पहचान न मिल सके। यह फैसला बेहद अहम था, क्योंकि आतंकियों का खास निशाना अमेरिकी नागरिक थे। नीरजा की सूझबूझ ने कई यात्रियों को संभावित खतरे से बचाया।
17 घंटे चला खौफनाक गतिरोध
विमान के अंदर करीब 17 घंटे तक तनावपूर्ण स्थिति बनी रही। इस दौरान नीरजा लगातार यात्रियों और क्रू को संभालती रहीं। हालात तब और बिगड़ गए जब विमान का ईंधन खत्म होने के बाद उसकी बिजली चली गई और केबिन अंधेरे में डूब गया। अंधेरा होते ही आतंकियों ने यात्रियों पर गोलीबारी शुरू कर दी। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। इसके बावजूद नीरजा ने हिम्मत नहीं छोड़ी और यात्रियों को विमान से बाहर निकालने के लिए आपातकालीन दरवाजे खुलवाने में मदद की।
तीन बच्चों को बचाने के लिए खुद सामने आ गईं
बचाव के दौरान नीरजा लगातार यात्रियों को बाहर निकाल रही थीं। इसी बीच आतंकियों की नजर तीन बच्चों पर पड़ी। नीरजा ने बच्चों को बचाने के लिए खुद को उनके सामने कर दिया। इसी दौरान आतंकियों ने उन पर गोलियां चला दीं। नीरजा गंभीर रूप से घायल हो गईं, लेकिन उनके प्रयासों की वजह से यात्रियों को विमान से बाहर निकलने का मौका मिला।
23 साल की उम्र में दी सर्वोच्च कुर्बानी
गोलियां लगने के बाद नीरजा को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। वह उस समय महज 22 साल की थीं और अपने 23वें जन्मदिन से सिर्फ दो दिन दूर थीं। इस घटना में विमान में सवार 379 लोगों में से 359 लोग बच गए। नीरजा की बहादुरी को भारत ने अशोक चक्र से सम्मानित किया। वह मरणोपरांत यह सम्मान पाने वाली पहली महिला और सबसे कम उम्र की प्राप्तकर्ता बनीं।
नीरजा की कहानी पर बनी फिल्म
नीरजा भनोट की कहानी को साल 2016 में बड़े पर्दे पर भी उतारा गया। राम माधवानी के निर्देशन में बनी फिल्म 'नीरजा' में सोनम कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिला, जबकि सोनम कपूर को भी विशेष उल्लेख मिला। नीरजा की कहानी आज भी इसलिए याद की जाती है क्योंकि उन्होंने खतरे की घड़ी में अपनी सुरक्षा से पहले उन लोगों की जिंदगी को प्राथमिकता दी, जिनकी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। चार दशक बाद भी उनकी बहादुरी भारतीय विमानन इतिहास की सबसे यादगार घटनाओं में शामिल है।