नई तकनीक: केंचुओं, पौधों और हाइड्रोपोनिक्स से उद्योगों का गंदा पानी होगा साफ

नई तकनीक: केंचुओं, पौधों और हाइड्रोपोनिक्स से उद्योगों का गंदा पानी होगा साफ

नई दिल्ली, 22 मई। केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक गंदे पानी को शुद्ध करने हेतु एक अभिनव और पर्यावरण के अनुकूल विधि विकसित की है। इस प्रणाली में केंचुए, जल-सब्जियां, सूक्ष्म जीवाणु और हाइड्रोपोनिक्स तकनीक का संयोजन किया गया है। एनआईटी राउरकेला के वैज्ञानिकों ने डेयरी उद्योग से निकलने वाले प्रदूषित पानी को साफ करने के लिए इस तकनीक का निर्माण किया है। यह पानी पनीर, दही और चीज बनाने वाली इकाइयों से निकलता है, जिसमें वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा काफी अधिक होती है। जब यह जल कभी-कभी नदियों या जलाशयों में जाता है, तो यह जल की ऑक्सीजन को कम कर देता है, जिससे जलीय जीवन के लिए संकट उत्पन्न हो जाता है।

अब तक उपयोग में लाई गई पारंपरिक तकनीकों में फिल्टर जल्दी बंद हो जाते थे। इसी चुनौती को हल करने के लिए एनआईटी राउरकेला की प्रोफेसर प्रो. काकोली करार पॉल और शोधार्थी डॉ. प्रज्ञान दास ने एक बहु-स्तरीय जैविक प्रणाली बनाई है। गौर करने वाली बात यह है कि इस तकनीक को पेटेंट प्राप्त हो चुका है।

इस प्रणाली में सबसे पहले गंदा पानी एक रिएक्टर में प्रवेश करता है, जहां केंचुए और जल पौधे होते हैं। केंचुए जैविक अपशिष्ट को छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं, जिससे सूक्ष्म जीव उन्हें आसानी से समाप्त कर पाते हैं। पौधों की जड़ें फिल्टर को अवरोधित होने से रोकती हैं। इसके बाद, पानी रेत की परत से गुजरता है, जो ठोस गंदगी को छानती है।

तीसरे चरण में, फ्लाई ऐश के बने पेलेट्स पानी में मौजूद फॉस्फोरस और अन्य प्रदूषकों को अवशोषित कर लेते हैं। फिर पानी कंकड़ों की परत से गुजरता है, जहां फायदेमंद सूक्ष्म जीव बचे हुए गंदगी को साफ करते हैं।

इस प्रक्रिया का अंतिम चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां, पानी हाइड्रोपोनिक चैंबर में पहुँचता है, जहां पौधों की जड़ें सीधे पानी में होती हैं। ये जड़ें पानी में ऑक्सीजन का उत्सर्जन करती हैं, जिसके कारण सहायक बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं और प्रदूषण को और कम करते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस संपूर्ण प्रणाली को प्रयोगशाला स्तर पर लगभग 10,000 रुपए की लागत पर विकसित किया गया है।

यह प्रत्येक दिन लगभग 30 लीटर डेयरी अपशिष्ट जल को शुद्ध कर सकता है। आवश्यकता होने पर इसे बड़े पैमाने पर भी विकसित किया जा सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि शुद्ध किया गया पानी कृषि में उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि इसमें आवश्यक पोषक तत्व जैसे फॉस्फेट मौजूद होते हैं।

साथ ही, इस प्रक्रिया में प्रयोग किए गए जल पौधों का उपयोग पशु चारे, बायोगैस और बायोडीजल के निर्माण में भी किया जा सकता है। मतलब यह तकनीक सिर्फ गंदा पानी ही नहीं साफ करती, बल्कि "कचरे से संसाधनों" के निर्माण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।