मुंबई, 21 मई। शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने गुरुवार को पीएम नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम जनता महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही है, जबकि पीएम विदेश यात्रा में व्यस्त हैं। उन्होंने बताया कि पिछले पांच दिन से प्रधानमंत्री विदेश में रहे, इस दौरान देश में महंगाई, बेरोजगारी और नागरिकों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया। दुबे ने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकताएँ जनता की वास्तविक चुनौतियों से टकराती हैं और केवल दिखावे की राजनीति की जा रही है। उनके मुताबिक, जनता अब इन बातों को समझने लगी है और असंतोष धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
आनंद दुबे ने देश की आर्थिक स्थिति को लेकर लोगों की चिंताओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि महंगाई निरंतर बढ़ रही है, रोजगार के अवसर घटते जा रहे हैं और आम परिवारों का बजट प्रभावित हो रहा है। उनके अनुसार, इन परिस्थितियों में सरकार की तरफ से दिए गए संदेश वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने वाले प्रतीत होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2029 के चुनावों में जनता इसका उचित उत्तर देने के लिए तैयार है।
कश्मीर के मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान के प्रति कठोर रुख अपनाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा। इस मुद्दे पर किसी भी वार्ता में देश की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में कई अवसरों पर कठोर कदम उठाने की संभावनाएं थीं, लेकिन वे सही तरीके से लागू नहीं हो पाईं, जो कि उनका व्यक्तिगत दृष्टिकोण है।
राहुल गांधी के बयानों पर प्रतिक्रिया में दुबे ने कहा कि विपक्षी नेता जनता के मुद्दों को उठाने का प्रयास कर रहे हैं, मुख्यतः महंगाई, शेयर बाजार की स्थिति और आम नागरिकों की आर्थिक समस्याओं पर। उन्होंने बताया कि विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश करता है ताकि अपनी बात जनता तक पहुँच सके। उनके अनुसार, यह राजनीतिक बातचीत लोकतंत्र की सामान्य विशेषता है।
'वंदे मातरम' के विषय पर उन्होंने कहा कि देशभक्ति के गीत और नारे हर भारतीय के लिए होना चाहिए, इसमें कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि विभिन्न राज्यों में लोग अपने-अपने तरीकों से राष्ट्रगीतों और देशभक्ति के भावों को स्वीकारते हैं, जो देश की विविधता के साथ एकता को दर्शाता है।
उन्होंने यह बताया कि जनता अब अधिक जागरूक हो रही है और राजनीतिक दावों और वास्तविकता के बीच का अंतर समझने लगी है। उनके अनुसार, लोग अब केवल नारों से प्रभावित नहीं होते, बल्कि वास्तविक काम और परिणामों को देखना चाहते हैं।