उज्जैन, 25 मई। ज्येष्ठ माह की शुक्ल नवमी की सुबह विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई। मंदिर का हर कोना शिवभक्तों के जयकारों से vibrate हो उठा। सोमवार होने के कारण भक्तों की संख्या अधिक थी। बाबा महाकाल के दर्शन के लिए देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने रविवार रात से ही लंबी कतारें लगानी शुरू कर दी थी। रातभर इंतजार के बाद भी भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ। हर कोई अपने प्रिय देवता की एक झलक पाने के लिए बेताब था।
नियम के अनुसार वीरभद्र से अनुमति मिलने के बाद मंदिर के दरवाजे खोले गए। इस अवसर पर उपस्थित भक्तों का उत्साह अद्भुत था। संपूर्ण मंदिर में 'जय श्री महाकाल' के जयकारों की आवाज गूंजने लगी। भक्तों की भारी भीड़ के बीच पूरे क्षेत्र में घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनाई दे रही थी।
इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा बाबा का जलाभिषेक किया गया और फिर उन्हें पंचामृत से स्नान कराया गया। स्नान के बाद बाबा महाकाल का आकर्षक और दिव्य श्रृंगार किया गया।
सोमवार को बाबा महाकाल को भांग, चंदन और सूखे मेवों से सजाया गया। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े के संतों ने बाबा को भस्म अर्पित की, जिसमें आरती के साथ भस्म अर्पित की गई। इस दौरान महाकाल भक्तों को निराकार रूप में दर्शन देते हैं।
भस्म आरती का धार्मिक महत्व बेहद खास माना जाता है। इसमें गोहरी, पीपल, पलाश, शमी और बेल जैसे पेड़ों की लकड़ियों की राख का उपयोग किया जाता है। मान्यता है कि इस समय भगवान महाकाल निराकार रूप में उपस्थित होते हैं। कहा जाता है कि दूषण नामक राक्षस का वध करने के बाद भगवान शिव ने उसकी राख से अपना श्रृंगार किया था, इसी कारण यह परंपरा आज तक चली आ रही है।