नई दिल्ली, 21 मई। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कैलाश मानसरोवर यात्रा (केएमवाई) 2026 के लिए यात्रियों का चयन करते हुए एक कंप्यूटराइज्ड ड्रॉ आयोजित किया। विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस यात्रा के लिए 1000 यात्रियों का चयन किया गया है। मंत्रालय ने बताया, "विदेश मंत्री ने आज कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 के लिए लॉटरी निकाली। सभी चुने गए यात्रियों को बधाई देते हैं और उनकी तीर्थयात्रा के सफल होने की कामना करते हैं।"
केएमवाई का आयोजन 2026 में जून से शुरू होकर अगस्त में समाप्त होगा। एक विशेष प्रक्रिया के तहत, 1000 यात्रियों का चयन किया गया है, जिसमें कंप्यूटर द्वारा रैंडम और जेंडर-बैलेंस्ड तरीके से किया गया है।
विदेश मंत्रालय ने बताया कि यात्रियों को 20 बैच में यात्रा कराई जाएगी, प्रत्येक बैच में 50 यात्री होंगे, और यात्रा लिपुलेख और नाथू ला दर्रे से की जाएगी। दोनों मार्ग अब पूरी तरह से मोटरेबल हो चुके हैं और इन्हें पार करने के लिए कम ट्रेकिंग की आवश्यकता होती है। बैचों और मार्गों की जानकारी यात्रा की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
चुने गए यात्रियों को चयन की सूचना एसएमएस और ईमेल के माध्यम से भेजी जा चुकी है। यात्रा के प्रतिभागी अपने चयन की स्थिति जानने के लिए यात्रा वेबसाइट पर लॉग इन कर सकते हैं या हेल्पलाइन नंबर 011-23088214 पर संपर्क कर सकते हैं।
भारत और चीन के बीच साल 2020 में गलवान विवाद के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा रोक दी गई थी। फिर भी, 2025 में दोनों देशों के बीच समझौते के बाद यात्रा को पुनः प्रारंभ करने की अनुमति दी गई थी।
2025 में कैलाश मानसरोवर यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें 5 बैचों में 50-50 यात्री शामिल हुए थे। ये यात्री उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथू ला दर्रे के माध्यम से यात्रा पर गए थे।
वहीं, हाल ही में कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख रूट पर नेपाल ने अपनी चिंता व्यक्त की थी। नेपाल की बालेंद्र शाह सरकार का कहना है कि इस क्षेत्र का उपयोग यात्रा के लिए नहीं होना चाहिए।
इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने भी प्रतिक्रिया दी। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा, "भारत का इस मामले में दृष्टिकोण स्पष्ट है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक पारंपरिक मार्ग है और इसका उपयोग दशकों से किया जा रहा है। यह नया नहीं है। क्षेत्रीय दावों के संबंध में, भारत ने हमेशा कहा है कि ये दावे न तो सही हैं और न ही किसी ऐतिहासिक तथ्य पर आधारित हैं। इस तरह के दावों को एकतरफा तरीके से बढ़ाना उचित नहीं है।"