जमशेदपुर में पर्यावरणविदों की अपील, नदी और पहाड़ों के लिए सख्त कानून की आवश्यकता

जमशेदपुर में पर्यावरणविदों की अपील, नदी और पहाड़ों के लिए सख्त कानून की आवश्यकता

जमशेदपुर, 22 मई। झारखंड के जमशेदपुर में शुक्रवार को प्रारंभ हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन में देशभर से आए पर्यावरण संरक्षण विशेषज्ञों, कानून के जानकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन प्रतिनिधियों ने नदियों और पहाड़ों के संरक्षण के लिए विशेष और प्रभावी कानून बनाने की जरूरत पर बल दिया। यह कार्यक्रम साकची स्थित मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल में आयोजित किया गया। सम्मेलन में मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्तकर्ता और जल संरक्षण के लिए मशहूर राजेंद्र सिंह ने केंद्र तथा राज्य सरकारों की पर्यावरण नीतियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पिछले 77 वर्षो में कई कानून बने, लेकिन नदियों और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कानूनी ढांचा नहीं बनाया गया है। उनका कहना था कि मौजूदा कानून केवल अस्थायी समाधान दे रहे हैं और प्रकृति का शोषण जारी है।

राजेंद्र सिंह ने अरावली पर्वत श्रृंखला का उदाहरण देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से कई खदानें बंद की गईं, लेकिन इसके बाद ऐसे निर्णय आए जिन्होंने पहाड़ों की परिभाषा को संकीर्ण कर दिया। उनका मानना है कि यह दृष्टिकोण संरक्षण के बजाय शोषण को बढ़ावा देता है।

उन्होंने कहा कि आजकल सतत विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित उपयोग किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी. गोपाला गौड़ा ने कहा कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बावजूद देश नदियों और पहाड़ों के संरक्षण के लिए कोई विशेष कानून नहीं बना पाया है। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की और सुझाव दिया कि संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस दिशा में कानून निर्माण किया जाना चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो नदियां और पहाड़ धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि नदियों और पहाड़ों की स्थिति निरंतर deteriorating हो रही है। उन्होंने स्वर्णरेखा नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि यह कभी लोगों की जीवनरेखा थी, लेकिन अब यह प्रदूषित हो चुकी है।

उन्हें साहेबगंज में पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई की चिंता भी है और उनका कहना है कि बिना प्रभावी कानून के संरक्षण संभव नहीं है। सम्मेलन में पर्यावरणविद दिनेश मिश्र ने बताया कि नदियों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि मातृ रूप में देखना चाहिए। वहीं 'जल बिरादरी' के राष्ट्रीय संयोजक बोलिशेट्टी सत्यनारायणा ने कहा कि पहाड़ों की सुरक्षा से ही बारिश और जल स्रोतों की सुरक्षा संभव है।

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के प्रोफेसर अंशुमाली ने यह दावा किया कि दामोदर नदी की लंबाई में 70 प्रतिशत की कमी आई है, जो गंभीर चिंता का विषय है। सम्मेलन में उपस्थित विभिन्न विशेषज्ञों ने नदी और पर्वत संरक्षण के लिए व्यापक जागरूकता, वैज्ञानिक अनुसंधान और मजबूत कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया।