नई दिल्ली, 24 मई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जानकारी दी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में फैलने वाले इबोला वायरस को एक गंभीर संकट के रूप में निरूपित किया है। इसी संदर्भ में, भारत ने अफ्रीका के लिए इबोला से लड़ने हेतु तत्काल चिकित्सा सामग्री और सुरक्षा किट की पहली खेप रवाना कर दी है। विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया पर लिखा, ''रविवार को अफ्रीका को तत्काल चिकित्सा सामग्री और सुरक्षा किट की पहली खेप भेजी गई। हम इबोला से संबंधित उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य परिस्थिति का सामना करने में अफ्रीका का सहयोग करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।''
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में इबोला वायरस को अत्यधिक खतरनाक बताया है। संगठन ने इसके आकलन स्तर को 'हाई' से बढ़ाकर 'वेरी हाई' (अत्यधिक) कर दिया है। हालांकि, डब्ल्यूएचओ का कहना है कि वैश्विक स्तर पर इसका खतरा अपेक्षाकृत कम है।
इस प्रकोप के संबंध में डब्ल्यूएचओ ने तथा पड़ोसी देश युगांडा में मामलों की पुष्टि के बाद अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति घोषित की है।
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने शुक्रवार को बताया कि अब तक डीआरसी में 82 मामलों और 7 मौतों की पुष्टि हो चुकी है। इसके अलावा, लगभग 750 संदिग्ध मामलों और 177 संदिग्ध मौतों का भी आंकड़ा प्राप्त हुआ है।
भारत सरकार ने अपने नागरिकों को सलाह दी है कि जो लोग इस समय कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान में हैं या वहां यात्रा करने वाले हैं, वे वहां की स्थानीय स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा जारी सिफारिशों का सख्ती से पालन करें और आवश्यक एहतियात बरतें।
तमिलनाडु के पब्लिक हेल्थ डायरेक्टरेट (DPH) ने सभी जिलों के स्वास्थ्य अधिकारियों को हाई अलर्ट पर रहने के निर्देश दिए हैं। इबोला प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग और चेकिंग को बढ़ा दिया गया है, खासकर उन यात्रियों पर जिन्होंने हाल ही में प्रभावित देशों की यात्रा की हो। साथ ही, पूरे स्वास्थ्य विभाग में अतिरिक्त तैयारियां भी की जा रही हैं।
किसी भी संभावित संदिग्ध मामले के लिए प्रमुख सरकारी अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों को तैनात रखा गया है।
मेडिकल कॉलेजों, जिला मुख्यालय अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्वास्थ्यकर्मियों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करें, जिसमें इसके लक्षण, फैलने के तरीके और संक्रमण-नियंत्रण की प्रक्रियाएं शामिल हैं।
डॉक्टरों, नर्सों और फील्ड स्टाफ के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि संदिग्ध संक्रमण की पहचान शीघ्रता से की जा सके और उनकी रिपोर्ट तुरंत की जा सके।