अलवर, 22 मई। भपंग वादन के लिए गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जाएगा। उन्हें 25 मई को दिल्ली में इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। भारत सरकार ने 25 जनवरी को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की थी। पुरस्कार मिलने पर उन्होंने कहा कि इतनी मेहनत के बाद इस सम्मान को पाकर वह बेहद खुशी महसूस कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह पुरस्कार उन्हें लगभग 20-25 वर्ष पहले मिल जाना चाहिए था। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी, केंद्र और राजस्थान सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि यह उनके जीवन के संघर्ष का फल है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने अपने जीवन का बहुत हिस्सा समर्पित किया है। उन्हें उम्मीद है कि उन्हें ऐसे रोजगार मिलेंगे जिससे वह अपनी कला को जारी रख सकें और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें। उन्होंने कहा कि कार्यक्रमों की कमी के कारण उनका गुजारा करना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने सरकार से अपनी कला को और प्रोत्साहन देने की अपील की और इस समर्थन के लिए आभार भी व्यक्त किया।
गफरुद्दीन ने सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार में अपने भपंग वादन की भूमिका को उजागर किया। उन्होंने कहा कि वह अपनी सरकार के साथ हैं और गांव-गांव जाकर भारत और राजस्थान सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को लोगों के बीच पहुंचा रहे हैं।
राजस्थान सरकार की ग्राम रथ योजना के अंतर्गत, वह लोगों को विभिन्न योजनाओं के बारे में जागरूक कर रहे हैं, जैसे कि तालाब खुदवाना, तारबंदी करना, पशुओं का टीकाकरण और जीवन बीमा। उन्होंने बताया कि वह केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के लाभ को गांवों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं और इस दिशा में सरकारी सहायता की भी उम्मीद रखते हैं।
गफरुद्दीन मेवाती की जिंदगी में ऐसे समय भी आए, जब वह अपने पिता के साथ घर-घर जाकर भगवान शिव के भजन गाते थे और आटा मांगते थे। संघर्ष और मेहनत के बाद आज वह इस मुकाम पर पहुंचे हैं। जब उनके पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा हुई, तो अलवर के लोक कलाकारों में खुशी की लहर दौड़ गई।
गफरुद्दीन मेवाती, जो भपंग वादन में प्रसिद्ध हैं, ने वैश्विक स्तर पर अपनी कला का प्रदर्शन किया है और करीब 60 देशों में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। वे 1978 में अलवर आए थे और मूल रूप से भरतपुर जिले के निवासी हैं। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उन्हें पद्मश्री मिलेगा, लेकिन अपनी कला के लिए उन्हें कई सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और विभिन्न स्तरों पर पुरस्कार भी शामिल हैं।
68 वर्षीय गफरुद्दीन का घर साधारण दिखाई देता है, लेकिन पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा के बाद उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। उनका घर अब किसी सेलिब्रिटी के घर जैसा लगता है। उन्होंने 1992 में पहली बार विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन किया था।
भगवान शिव के डमरू से प्रेरित भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती इस वाद्य यंत्र को पीढ़ी दर पीढ़ी अपने परिवार से सीखते आ रहे हैं। उनके बेटे शाहरुख मेवाती जोगी इस परंपरा की आठवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, और अन्य परिवार के बच्चे भी भपंग बजाते हैं। शाहरुख ने मेवात संस्कृति पर पीएचडी की है। भपंग के साथ महाभारत की कथाएं मेवात क्षेत्र में 'पांडव कड़े' के नाम से प्रस्तुत की जाती हैं।