बांग्लादेश ने जल संकट और कृषि विकास से निपटने के लिए बहुप्रतीक्षित पद्मा और तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री और बीएनपी (BNP) चेयरमैन तारिक रहमान ने साफ कर दिया है कि उनकी सरकार इन दोनों परियोजनाओं पर जल्द काम शुरू करेगी। खास बात यह है कि इस पूरे प्रोजेक्ट में चीन की बड़ी आर्थिक भूमिका होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ गई हैं।
पद्मा और तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट को मिली हरी झंडी
ढाका के पास गाजीपुर में ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान’ की आधारशिला रखने के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए तारिक रहमान ने कहा कि उनकी सरकार पद्मा और तीस्ता दोनों बैराज परियोजनाओं को शुरू करेगी। उन्होंने कहा, “तीस्ता मुद्दे पर अगर किसी ने लगातार काम किया है और जमीन तैयार की है, तो वह बीएनपी ही है।” सरकार पहले ही राजशाही क्षेत्र में पद्मा बैराज को मंजूरी दे चुकी है और अब तीस्ता बैराज को भी आधिकारिक स्वीकृति मिल गई है।
चीन दौरे से पहले बड़ा संकेत
तारिक रहमान जून के अंत में चीन के दौरे पर जाने वाले हैं। माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान तीस्ता बैराज समेत कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए चीन से फंडिंग पर चर्चा होगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट अरबों डॉलर का हो सकता है और इसमें चीन की सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका रहने की संभावना है।
जल संकट और फरक्का बैराज का मुद्दा
रहमान ने बांग्लादेश में बढ़ते जल संकट का जिक्र करते हुए कहा कि सूखे के मौसम में देश को पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के फरक्का बैराज की वजह से दक्षिणी बांग्लादेश में समुद्र का खारा पानी घुस रहा है। उन्होंने कहा कि इसका असर सुंदरबन और आसपास के पर्यावरण पर पड़ रहा है। “खारापन बढ़ने से पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं और कई जीव-जंतु विलुप्त होने की कगार पर हैं,” उन्होंने कहा।
मॉनसून का पानी जमा करने की योजना
तारिक रहमान ने कहा कि तीस्ता और पद्मा बैराज का मुख्य उद्देश्य मॉनसून के अतिरिक्त पानी को संरक्षित करना है ताकि सूखे के समय किसानों और आम लोगों को पानी उपलब्ध कराया जा सके। उनके मुताबिक, यह परियोजना बांग्लादेश की कृषि और जल प्रबंधन व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।
भारत-बांग्लादेश जल विवाद फिर चर्चा में
भारत और बांग्लादेश के बीच नदियों के जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। 1996 में गंगा जल बंटवारे पर हुई संधि की अवधि इसी साल दिसंबर में खत्म हो रही है और दोनों देशों के बीच इसे लेकर बातचीत जारी है। वहीं, तीस्ता जल बंटवारा समझौता 2011 से अटका हुआ है। बताया जाता है कि पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण इस पर अब तक हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं।
भारत की सबसे बड़ी चिंता: सिलीगुड़ी कॉरिडोर
भारत के लिए यह सिर्फ जल प्रबंधन परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला भी बन गया है। तीस्ता नदी का इलाका भारत के रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी “चिकन नेक” के करीब है। यह संकरा भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। ऐसे में इस इलाके में चीनी इंजीनियरों और कंपनियों की मौजूदगी को भारत सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा मान रहा है।
चीन की बढ़ती मौजूदगी से नई दिल्ली सतर्क
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने मई 2026 में बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात कर इस लगभग 1 अरब डॉलर की परियोजना के लिए मदद मांगी है। चीन इस प्रोजेक्ट को अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत आगे बढ़ाना चाहता है। अगर ऐसा होता है तो बांग्लादेश के इंफ्रास्ट्रक्चर और जल प्रबंधन क्षेत्र में चीन की पकड़ और मजबूत हो सकती है।
भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम भारत के लिए कूटनीतिक झटका भी हो सकता है। शेख हसीना सरकार के दौरान भारत ने इस प्रोजेक्ट में तकनीकी सहयोग देकर चीन को दूर रखने की कोशिश की थी। लेकिन अब बीएनपी सरकार के सत्ता में आने के बाद ढाका का झुकाव बीजिंग की तरफ बढ़ता दिख रहा है। इससे यह संदेश भी जाता है कि अगर भारत आंतरिक राजनीतिक कारणों से लंबित समझौतों को आगे नहीं बढ़ा पाता, तो पड़ोसी देश दूसरे विकल्पों की तरफ रुख कर सकते हैं।
क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ सकती है प्रतिस्पर्धा
तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट अब सिर्फ जल प्रबंधन की योजना नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का अहम मुद्दा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में चीन, भारत और बांग्लादेश के बीच इस परियोजना को लेकर कूटनीतिक और रणनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।