बछेंद्री पाल: एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला, लाखों बेटियों को प्रेरित किया

बछेंद्री पाल: एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला, लाखों बेटियों को प्रेरित किया

बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई 1954 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी के एक दुर्गम पहाड़ी गांव नकुरी में हुआ। दिलचस्प बात यह है कि उनके जन्म की तारीख सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे की एवरेस्ट पर विजय की पहली वर्षगांठ से पांच दिन पहले थी। उनका परिवार पारंपरिक भोटिया जनजाति से संबंधित था, जो भारत के हिमालयी क्षेत्रों में बसी हुई है।

उनके पिता किशन सिंह पाल एक सीमांत व्यापारी थे, जो खच्चरों और बकरियों पर आटा और चावल लेकर तिब्बत जाते थे। उनकी मां हंसा देवी घर की देखरेख के साथ-साथ कालीन बुनाई का काम भी करती थीं। 1943 में आई भयानक बाढ़ ने उनके पैतृक गांव हर्षिल को बर्बाद कर दिया था, जिसके कारण उनके परिवार को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

बछेंद्री पाल बचपन से ही असामान्य सोच की थीं। केवल 12 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल की पिकनिक के दौरान बिना किसी तैयारी के लगभग 13,000 फीट ऊँची चोटी पर चढ़ाई की। उस रात वह अपनी सहेलियों के साथ पहाड़ पर ही फंसी रहीं। घर लौटने पर उनकी तारीफ करने के बजाय डांट सुननी पड़ी। जब उन्होंने देखा कि उनके भाइयों को पर्वतारोहण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है जबकि उन्हें घरेलू कामों के लिए कहा जा रहा है, तब उनके मन में इस सोच को चुनौती देने की प्रेरणा जाग उठी।

हालात कठिन होने के बावजूद बछेंद्री पाल ने अपनी शिक्षा जारी रखी। परिवार और समाज के विरोध के बीच उन्होंने संस्कृत में एमए और बीएड की डिग्री प्राप्त की। अपनी पढ़ाई के खर्च को पूरा करने के लिए उन्होंने रात-रात भर कपड़े सिलने का काम किया। वे अपने गांव की पहली महिला स्नातक बनीं।

उन्होंने उत्तरकाशी के नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एनआईएम) में दाखिला लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने गंगोत्री प्रथम और माउंट रुद्रगैरा जैसी कठिन चोटियों को फतह कर यह साबित किया कि वह एक अद्वितीय पर्वतारोही हैं।

1984 में भारतीय एवरेस्ट अभियान में शामिल होने वाली बछेंद्री पाल के लिए यह यात्रा सिर्फ एक शारीरिक चुनौती नहीं थी, बल्कि करोड़ों महिलाओं के सपनों के साकार होने का प्रतीक थी। इस यात्रा के दौरान उन्होंने शेरपा कुली की मौत का सामना किया और एक खतरनाक हिमस्खलन से गुजरी, जिसने कई साहसी पुरुषों की हिम्मत तोड़ दी।

23 मई 1984 को जब वह 26,000 फीट ऊँचाई पर स्थित साउथ कोल कैंप पहुंचीं, तो वह अंतिम चढ़ाई दल में एकमात्र महिला थीं। इसी दिन की सुबह कड़ाके की ठंड (-30°C से -40°C) और 100 किमी/घंटा की बर्फीली आंधी के बीच उन्होंने सिरदार आंग दोरजे के साथ अपनी अंतिम चढ़ाई का आगाज किया।

दोपहर के समय बछेंद्री पाल ने उस चोटी पर कदम रखा, जहां पहुँचने की ख्वाहिश हर पर्वतारोही रखता है। वह माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली भारत की पहली और दुनिया की पाँचवीं महिला बन गईं।

बछेंद्री पाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी सफलता को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा। दिसंबर 1983 में टाटा स्टील ने उनके कौशल को पहचान कर उन्हें खेल विभाग में शामिल किया। बाद में वह 'टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन' (टीएसएएफ) की निदेशक बन गईं और तीन दशकों तक हजारों युवाओं को जीवन कौशल और नेतृत्व सिखाया।

उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों, ग्रामीणों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों की प्रतिभा को उजागर किया। उनके मार्गदर्शन में अरुणिमा सिन्हा (जो एक ट्रेन हादसे में अपना पैर खो चुकी थीं) ने कृत्रिम पैर के साथ एवरेस्ट पर विजय प्राप्त की।

भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री (1984) और पद्म भूषण (2019) जैसे उच्च नागरिक सम्मान देकर सम्मानित किया।