जयपुर, 21 मई। राजस्थान हाईकोर्ट ने नागौर जिले में हुई एक ज्वेलरी चोरी की पुलिस जांच पर तीखी टिप्पणी की, जिसमें यह खुलासा हुआ कि एक ‘तांत्रिक’ का प्रभाव जांच पर पड़ा था। यह आदेश एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण ने, नागौर के श्री बालाजी थाना क्षेत्र के उतवलिया गांव की 80 वर्षीय याचिकाकर्ता खेमी देवी की याचिका के संदर्भ में दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि नागौर के एसपी को जांच को श्रीबालाजी थाने से हटा कर किसी अन्य थाने के सब-इंस्पेक्टर या वरिष्ठ अधिकारी को सौंपना चाहिए। याचिका में खेमी देवी ने 8 मार्च को एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें 7 मार्च की रात को उनके घर से सोने-चांदी के गहनों की चोरी का आरोप लगाया गया था। उनके वकील मनोहर सिंह राठौड़ ने कोर्ट को बताया कि संदिग्धों के नाम दिए जाने के बावजूद जांच अधिकारी हेड कांस्टेबल रतिराम ने न तो गहनों की बरामदगी की और न ही आरोपियों की पहचान कर पाए।
याचिका में यह भी कहा गया था कि जांच अधिकारी ने साक्ष्यों पर ध्यान देने के बजाय अंधविश्वास का सहारा लिया और अलवर जिले में एक तांत्रिक से मिलकर लड़की के ससुर और कुछ ग्रामीणों के साथ बातचीत की। आरोपों के अनुसार, तांत्रिक ने लड़की के ससुर को संदिग्ध माना, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस ने बिना ठोस सबूत के उन्हें संदिग्ध मान लिया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से विक्रम सिंह राजपुरोहित ने एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया कि जांच अधिकारी ने कई संदिग्धों से पूछताछ की और विभिन्न स्थानों का दौरा किया। हालांकि, सरकार ने स्वीकार किया कि ग्रामीणों को तांत्रिक के पास ले जाने की बात सही नहीं थी लेकिन इसे भी माना गया कि जांच अधिकारी खुद अलवर स्थित तांत्रिक के पास गए थे।
मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि यह मुमकिन है कि जांच तांत्रिक की सलाह से प्रभावित हुई हो। कोर्ट ने इस पर जोर दिया कि अपराधियों की पहचान के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है और किसी भी हालत में आपराधिक जांच तांत्रिक के कहने पर नहीं चलनी चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने मौजूदा जांच अधिकारी को हटाने और 15 दिनों के भीतर नए अधिकारी को नियुक्त करने का आदेश दिया।